मराठी
महाराष्ट्र राज्य शिक्षण मंडळएस.एस.सी (हिंदी माध्यम) इयत्ता १० वी

परिच्छेद - २ भगिनी निवेदिता एक विदेशी महिला थीं, किंतु उन्होंने इस देश के नवोत्‍थान और भारतीय राष्‍ट्रीयता के विकास के लिए बहुत कुछ किया। जीवन के संबंध में उनका दृष्‍टिकोण बड़ा ही उदार था, सम

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प्रश्न

निम्‍नलिखित परिच्छेद पढ़कर ऐसे पाँच प्रश्न तैयार कीजिए जिनके उत्‍तर एक-एक वाक्‍य में हों :

परिच्छेद - २

     भगिनी निवेदिता एक विदेशी महिला थीं, किंतु उन्होंने इस देश के नवोत्‍थान और भारतीय राष्‍ट्रीयता के विकास के लिए बहुत कुछ किया। जीवन के संबंध में उनका दृष्‍टिकोण बड़ा ही उदार था, समूचे संसार को वे एक ऐसी अविभाजनशील इकाई मानती थीं जिसका हर पहलू एक-दूसरे से संश्लिष्‍ट और अन्योन्याश्रयी है। लंदन में एक दिन स्‍वामी विवेकानंद के श्रीमुख से उनकी वक्‍तृता सुनकर इनमें अकस्‍मात परिवर्तन हुआ। २8 वर्षीय मिस मार्गरेट नोबुल, जो आयरिश थी, स्‍वामी जी की वाणी से इतनी अभिभूत हो उठीं कि भगिनी निवेदिता के रूप में उनका शिष्‍यत्‍व ग्रहण कर वह अपनी संवेदना, हृदय में उभरती असंख्य भाव-लहरियों को बाँध न सकी और भारत के साथ उनका घनिष्‍ठ रागात्‍मक संबंध कायम हो गया।

     ऐसा लगता था जैसे वह भारत की मिट्टी से उपजी हों या स्‍वर्ग दुहिता-सी अपने प्रकाश से यहाँ के अंधकार को दूर करने आई हों। ज्‍यों ही वे इधर आईं देशव्यापी पुनर्जागरण के साथ-साथ शिक्षा, धर्म और संस्‍कृति के क्षेत्र में उन्हें क्रांतिकारी परिवर्तन करने की आवश्यकता अनुभव हुई।

प्रश्न :

१. ______

२. ______

३. ______

४. ______

५. ______

टीपा लिहा
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उत्तर

प्रश्न :

१. एक विदेशी महिला होते हुए भी भगिनी निवेदिता ने भारत के लिए क्या किया?

२. जीवन के संबंध में उनका दृष्टिकोण कैसा था?

३. भगिनी निवेदिता में परिवर्तन कैसे आया?

४. भगिनी निवेदिता स्वामी विवेकानंद का शिष्यत्व ग्रहण करने के पूर्व कौन थी?

५. भारत आने पर भगिनी निवेदिता किन क्षेत्रों में परिवर्तन की आवश्यकता अनुभव हुई?

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गद्‍य आकलन
  या प्रश्नात किंवा उत्तरात काही त्रुटी आहे का?
पाठ 2.11: दुख - उपयोजित लेखन [पृष्ठ ११६]

APPEARS IN

बालभारती Hindi Kumarbharati Standard 10 Maharashtra State Board
पाठ 2.11 दुख
उपयोजित लेखन | Q २. | पृष्ठ ११६

संबंधित प्रश्‍न

निम्नलिखित अपठित गद्यांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए:

उन दिनों बापू की हिन्दी अच्छी नहीं थी, पर वे अपनी अट-पट वाणी में ही अपना सारा आशय कह डालते थे। वे शब्दों में बोलते कहाँ थे, उनका हृदय बोलता था। उनका व्यक्तित्व बोलता था, उनकी साधना बोलती थी और उनके बोल हृदय में घुल जाते थे, कान बेकार खड़े रहते थे। मैं बहुत दिन यही समझता रहा कि ‘वक्त के साथ दगाबाजी’ बापू की अट-पटी हिन्दी का एक नमूना है। पता नहीं, वे क्या कहना चाहते थे और हिन्दी में उनको यही शब्द सुलभ हो पाए। पर जब सोचता हूँ बापू बिल्कुल यही कहना चाहते थे और जो वे कहना चाहते थे, उसको दूसरे शब्दों में नहीं कहा जा सकता। एक शब्द एक मात्रा से कम नहीं। बापू बनिया थे, अपने बनियेपन पर उन्हें गर्व था। शायद शब्दों के मामले में वे सबसे अधिक बनिये थे। न जरूरत से ज्यादा न जरूरत से कम। और हर शब्द सच्चा, खरा यथार्थ भरा।

(1) संजाल पूर्ण कीजिए: (2)

(2) ‘वाणी का महत्व’ इस विषय पर 25 से 30 शब्दों में अपने विचार व्यक्त कीजिए। (2)


निम्नलिखित गद्यांश पढ़कर ऐसे चार प्रश्न तैयार कीजिए, जिनके उत्तर गद्यांश में एक-एक वाक्य में हों :

एक बार भगवान बुदूध का एक प्रचारक घूम रहा था। उसे एक भिखारी मिला। वह प्रचारक उसे धर्म का उपदेश देने लगा। उस भिखारी ने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया। उसमें उसका मन ही नहीं लगता था। प्रचारक नाराज हुआ। बुदूध के पास जाकर बोला, "वहाँ एक भिखारी बैठा है, मैं उसे इतने अच्छे-अच्छे सिखावन दे रहा था, तो भी वह सुनतां ही नहीं।" बुदूध ने कहा, "उसे मेरे पास लाओ।" यह प्रचारक उसे बुदूध के पास ले गया। भगवान बुद्ध ने उसकी दशा देखीं। उन्होंने ताड़ लिया कि भिखारी तीन-चार दिनों से भूखा है। उन्होंने उसे पेट भरकर खिलाया और कहा, “अब जाओ।'' प्रचारक ने कहा, "आपने उसे खिला तो दिया, लेकिन उपदेश कुछ भी नहीं दिया।" भगवान बुदूध ने कहा, "आज उसके लिए अन्न हीं उपदेश था। आज उसे अन्न की सबसे ज्यादा जरूरत थी। वह उसे पहले देना चाहिए। अगर वह जिएगा तो कल सुनेगा।"

निम्नलिखित गद्यांश पढ़कर ऐसे चार प्रश्न तैयार कीजिए जिनके उत्तर गद्यांश में एक-एक वाक्य में हों -

सफलता या असफलता जीवन के दो पहलू हैं। व्यक्ति जैसा कर्म करता है, उसी के अनुसार उसे फल मिलता है। मेहनतकश इंसान जीवन कों सफल बना सकता है। आलसी व्यक्ति इस पृथ्वी पर एक बोझ की तरह होता है। अत: 'व्यंक्ति को सदा कर्म पर ही ध्यान देना चाहिए। अच्छे कर्म से व्यक्ति को परम आनन्द की प्राप्ति होती है। ऐसे व्यक्ति परोपकारी होते हैं। समाज में परोधकारी व्यक्ति को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।

निम्‍नलिखित गद्यांश पढ़कर ऐसे चार प्रश्न तैयार कीजिए जिनके उत्‍तर गद्यांश में एक-एक वाक्‍य में हों:

           विख्यात गणितज्ञ सी. वी. रमन ने छात्रावस्‍था में ही विज्ञान के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का सिक्का देश में ही नहीं विदेशों में भी जमा 
लिया था।
           रमन का एक साथी छात्र ध्वनि के संबंध में कुछ प्रयोग कर रहा था। उसे कुछ कठनिाइयाँ प्रतीत हुईं, संदेह हुए। वह अपने अध्यापक जोन्स साहब के पास गया परंतु वह भी उसका संदेह निवारण न कर सके। रमन को पता चला तो उन्होंने उस समस्‍या का अध्ययन-मनन किया और इस संबंध में उस समय के प्रसिद्ध लॉर्ड रेले के निबंध पढ़े और उस समस्‍या का एक नया ही हल खोज निकाला। यह हल पहले हल से सरल और अच्छा था। लाॅर्ड रेले को इस बात का पता चला तो उन्होंने रमन की प्रतिभा की भूरि-भूरि प्रशंसा की। अध्यापक जोन्स भी प्रसन्न हुए और उन्होंने रमन से इस प्रयोग के संबंध में लेख लिखने को कहा।

उपयुक्त प्रश्नचार्ट:


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निम्नलिखित गद्यांश पढ़कर ऐसे चार प्रश्न तैयार कीजिए जिनके उत्तर गद्यांश में एक-एक वाक्य में हों।

महात्मा गाँधी ने पुस्तकों को व्यक्ति का सच्चा मित्र कहा है। पुस्तकों से अधिक आनंद और कहीं, किसी वस्तु में नहीं है। पुस्तकें ज्ञान का भंडार होती हैं। पुस्तकों में समाज पर प्रभाव डालने की अद्भुत क्षमता होती है। पुस्तक में ऐसी शक्ति होती है कि वह सोए देश में जागृति मंत्र फूँक दे, कमजोर मानव को बल दे, राजनेताओं पर अंकुश रखे। रूसो की पुस्तक फ्रांस में क्रांति का कारण बनी। लेनिन की पुस्तक रूस में मार्गदर्शक बनी तो गाँधी के विचार भारत को स्वतंत्र करा गए। इस प्रकार हम देखते हैं कि पुस्तकें पलभर में बादशाहत को पलटने की क्षमता रखती हैं। पुस्तकें लेखकों को अमर बना देती हैं। हम आज भी सूर, तुलसी, वाल्मीकि का नाम बहुत श्रद्धा से लेते हैं। पुस्तकें अकेलेपन की साथी भी हैं; क्योंकि ये अकेलेपन को भुलाए रहती हैं।

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