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प्रश्न
दो मित्र, मीरा व शाहिद, विगत कुछ वर्षों में भारत की आर्थिक वृद्धि की तुलना कर रहे थे। मीरा ने वर्तमान बाज़ार मूल्यों पर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में वृद्धि का उल्लेख किया, जबकि शाहिद ने मुद्रास्फीति के समायोजन के पश्चात्, सकल घरेलू उत्पाद (GDP) पर विचार करने पर बल दिया। दोनों में से कौन सा उपाय लोगों के कल्याण का सही चित्र प्रस्तुत करता है, इस पर दोनों की बहस अनिर्णीत रही।
उपरोक्त स्थिति को ध्यान में रखते हुए, वैध कारण सहित विस्तार से उल्लेख करें कि दोनों में से किस चर को कल्याण का बेहतर संकेतक माना जाता है तथा क्यों?
सविस्तर उत्तर
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उत्तर
- मीरा मौद्रिक सकल घरेलू उत्पाद (वर्तमान कीमतों पर GDP) देख रही है, जो केवल कीमतों के बढ़ जाने से भी बढ़ सकता है, भले ही उत्पादन अपरिवर्तित रहे। शाहिद वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (स्थिर/आधार वर्ष की कीमतों पर GDP) की वकालत कर रहा है, जो आधार वर्ष की कीमतें स्थिर रखकर वास्तविक भौतिक उत्पादन में होने वाले परिवर्तनों को अलग करता है; यह पाठ्यपुस्तकीय व्याख्या के अनुरूप है।
- कल्याण (welfare) व्यक्ति-प्रति उपलब्ध वस्तुओं और सेवाओं की मात्रा से जुड़ा होता है। यदि मौद्रिक GDP केवल इस कारण दोगुना हो जाता है कि कीमतें दोगुनी हो गईं, तो लोग बेहतर नहीं हुए; वे समान वस्तुओं के लिए केवल अधिक भुगतान कर रहे हैं। वास्तविक GDP तभी बढ़ता है जब उत्पादन की मात्रा बढ़े।
- अतः आर्थिक कल्याण का एक बेहतर माप वास्तविक GDP है, क्योंकि यह मुद्रास्फीति से उत्पन्न “मौद्रिक भ्रांति/भ्रम” को हटाकर नागरिकों के पास उपलब्ध वास्तविक संसाधनों में हुए वास्तविक वृद्धि को दर्शाता है।
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या प्रश्नात किंवा उत्तरात काही त्रुटी आहे का?
