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Arts (Hindi Medium) कक्षा १२ - CBSE Question Bank Solutions for Hindi (Core)

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Hindi (Core)
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आसमान में रंग-बिरंगी पतंगों को देखकर आपके मन में कैसे खयाल आते हैं? लिखिए।

[1.02] आलोक धन्वा : पतंग
Chapter: [1.02] आलोक धन्वा : पतंग
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'रोमांचित शरीर का संगीत' का जीवन के लय से क्या संबंध है?

[1.02] आलोक धन्वा : पतंग
Chapter: [1.02] आलोक धन्वा : पतंग
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'महज़ एक धागे के सहारे, पतंगों की धड़कती ऊँचाइयाँ' उन्हें (बच्चों को) कैसे थाम लेती हैं? चर्चा करें।

[1.02] आलोक धन्वा : पतंग
Chapter: [1.02] आलोक धन्वा : पतंग
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हिंदी साहित्य के विभिन्न कालों में तुलसी, जायसी, मतिराम, द्विजदेव, मैथिलीशरण गुप्त आदि कवियों ने भी शरद ऋतु का सुंदर वर्णन किया है। आप उन्हें तलाश कर कक्षा में सुनाएँ और चर्चा करें कि पतंग कविता में शरद ऋतु वर्णन उनसे किस प्रकार भिन्न हैं?
[1.02] आलोक धन्वा : पतंग
Chapter: [1.02] आलोक धन्वा : पतंग
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आपके जीवन में शरद ऋतु क्या मायने रखती है?

[1.02] आलोक धन्वा : पतंग
Chapter: [1.02] आलोक धन्वा : पतंग
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इस कविता के बहाने बताएँ कि 'सब घर एक कर देने के माने' क्या है?

[1.03] कुँवर नारायण : कविता के बहाने, बात सीधी थी पर
Chapter: [1.03] कुँवर नारायण : कविता के बहाने, बात सीधी थी पर
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'उड़ने' और 'खिलने' का कविता से क्या संबंध बनता है?

[1.03] कुँवर नारायण : कविता के बहाने, बात सीधी थी पर
Chapter: [1.03] कुँवर नारायण : कविता के बहाने, बात सीधी थी पर
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कविता के संदर्भ में 'बिना मुरझाए महकने के माने' क्या होते हैं?

[1.03] कुँवर नारायण : कविता के बहाने, बात सीधी थी पर
Chapter: [1.03] कुँवर नारायण : कविता के बहाने, बात सीधी थी पर
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कविता में कुछ पंक्तियाँ कोष्ठकों में रखी गई हैं- आपकी समझ से इसका क्या औचित्य है?

[1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
Chapter: [1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
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कैमरे में बंद अपाहिज करुणा के मुखौटे में छिपी क्रूरता की कविता है- विचार कीजिए।

[1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
Chapter: [1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
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हम समर्थ शक्तिवान और हम एक दुर्बल को लाएँगे पंक्ति के माध्यम से कवि ने क्या व्यंग्य किया है?

[1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
Chapter: [1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
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यदि शारीरिक रूप से चुनौती का सामना कर रहे व्यक्ति और दर्शक, दोनों एक साथ रोने लगेंगे, तो उससे प्रश्नकर्ता का कौन-सा उद्देश्य पूरा होगा?
[1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
Chapter: [1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
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परदे पर वक्त की कीमत है कहकर कवि ने पूरे साक्षात्कार के प्रति अपना नज़रिया किस रूप में रखा है?

[1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
Chapter: [1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
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यदि आपको शारीरिक चुनौती का सामना कर रहे किसी मित्र का परिचय लोगों से करवाना हो, तो किन शब्दों में करवाएँगी?

[1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
Chapter: [1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
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सामाजिक उद्देश्य से युक्त ऐसे कार्यक्रम को देखकर आपको कैसा लगेगा? अपने विचार संक्षेप में लिखें।
[1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
Chapter: [1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
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यदि आप इस कार्यक्रम के दर्शक हैं, तो टी.वी. पर ऐसे सामाजिक कार्यक्रम को देखकर एक पत्र में अपनी प्रतिक्रिया दूरदर्शन निदेशक को भेजें।
[1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
Chapter: [1.04] रघुवीर सहाय : कैमरे में बंद अपाहिज
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टिप्पणी कीजिएः गरबीली गरीबी, भीतर की सरिता, बहलाती सहलाती आत्मीयता, ममता के बादल।

[1.05] गजानन माधव मुक्तिबोध : सहर्ष स्वीकारा है
Chapter: [1.05] गजानन माधव मुक्तिबोध : सहर्ष स्वीकारा है
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इस कविता में और भी टिप्पणी-योग्य पद-प्रयोग हैं। ऐसे किसी एक प्रयोग का अपनी ओर से उल्लेख कर उस पर टिप्पणी करें।

[1.05] गजानन माधव मुक्तिबोध : सहर्ष स्वीकारा है
Chapter: [1.05] गजानन माधव मुक्तिबोध : सहर्ष स्वीकारा है
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व्याख्या कीजिएः
जाने क्या रिश्ता है, जाने क्या नाता है
जितना भी उँड़ेलता हूँ, भर-भर फिर आता है
दिल में क्या झरना है?
मीठे पानी का सोता है
भीतर वह, ऊपर तुम
मुसकाता चाँद ज्यों धरती पर रात-भर
मुझ पर त्यों तुम्हारा ही खिलता वह चेहरा है!

उपर्युक्त पंक्तियों की व्याख्या करते हुए यह बताइए कि यहाँ चाँद की तरह आत्मा पर झुका चेहरा भूलकर अंधकार-अमावस्या में नहाने की बात क्यों की गई है?

[1.05] गजानन माधव मुक्तिबोध : सहर्ष स्वीकारा है
Chapter: [1.05] गजानन माधव मुक्तिबोध : सहर्ष स्वीकारा है
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बहलाती सहलाती आत्मीयता बरदाश्त नहीं होती है- और कविता के शीर्षक सहर्ष स्वीकारा है में आप कैसे अंतर्विरोध पाते हैं। चर्चा कीजिए।

[1.05] गजानन माधव मुक्तिबोध : सहर्ष स्वीकारा है
Chapter: [1.05] गजानन माधव मुक्तिबोध : सहर्ष स्वीकारा है
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