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सूक्ष्मजीवों का प्रयोग रसायन उर्वरकों तथा पीड़कनाशियों के प्रयोग को कम करने के लिए भी किया जा सकता है। यह किस प्रकार संपन्न होगा? व्याख्या कीजिए। - Biology (जीव विज्ञान)

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प्रश्न

सूक्ष्मजीवों का प्रयोग रसायन उर्वरकों तथा पीड़कनाशियों के प्रयोग को कम करने के लिए भी किया जा सकता है। यह किस प्रकार संपन्न होगा? व्याख्या कीजिए।

स्पष्ट कीजिए
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उत्तर

  1. जैव नियंत्रण: पादप रोगों तथा पीड़कों (pests) के नियंत्रण के लिए जैववैज्ञानिक विधि का प्रयोग ही जैव नियंत्रण है। आधुनिक समाज में ये समस्याएँ रसायनों, कीटनाशियों तथा पीड़कनाशियों के बढ़ते हुए प्रयोगों की सहायता से नियंत्रण की जाती हैं। ये रसायन मनुष्यों तथा जीव-जंतुओं के लिए अत्यंत ही विषैले तथा हानिकारक हैं। विषाक्त रसायन आहार श्रृंखला के माध्यम से जीवित जीवों के शरीर में पहुंचते हैं। ये पर्यावरण को भी प्रदूषित करते हैं।
  2. जैव उर्वरक के रूप में सूक्ष्मजीव: जैव उर्वरकों का मुख्य स्रोत जीवाणु, कवक तथा सायनोबैक्टीरिया होते हैं। लेग्यूमिनस पादपों की जड़ों पर स्थित ग्रंथियों का निर्माण राइजोबियम जीवाणु के सहजीवी संबंध द्वारा होता है। ये जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिरीकृत कर कार्बनिक रूप में परिवर्तित कर देते हैं। मृदा में मुक्तावस्था में रहने वाले अन्य जीवाणु जैसे एजोस्पाइरिलम तथा एजोटोबैक्टर भी वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर कर मृदा में नाइट्रोजन अवयव की मात्रा को बढ़ाते हैं। कवक अनेक पादपों के साथ सहजीवी संबंध स्थापित करते हैं। इस संबंध को माइकोराइजा कहते हैं। ग्लोमस जीनस के बहुत-से कवक सदस्य माइकोराइजा बनाते हैं। इस संबंध में कवकीय सहजीवी मृदा से जल एवं पोषक तत्वों का अवशोषण कर पादपों को प्रदान करते हैं और पादपों से भोजन प्राप्त करते हैं। सायनोबैक्टीरिया स्वपोषित सूक्ष्मजीव हैं जो जलीय तथा स्थलीय वायुमंडल में विस्तृत रूप से पाए जाते हैं। इनमें से अधिकांश वायुमंडलीय नाइट्रोजन को नाइट्रोजनी यौगिक के रूप में स्थिर करके मृदा की उर्वरता को बढ़ाते हैं। उदाहरण के लिए, ऐनाबीना, नॉसटॉक आदि। धान के खेत में सायनोबैक्टीरिया महत्त्वपूर्ण जैव उर्वरक की भूमिका निभाते हैं।
  3. पीड़क तथा रोगों का जैव नियंत्रण: जैव नियंत्रण विधि से विषाक्त रसायन तथा पीड़कनाशियों पर हमारी निर्भरता को काफी हद तक कम किया जा सकता है। बैक्टीरिया बैसिलस थूरिजिऐंसिस को प्रयोग बटरफ्लाई कैटरपिलर नियंत्रण में किया जाता है। पिछले दशक में आनुवंशिक अभियांत्रिकी की सहायता से वैज्ञानिक बैसीलस थूरिजिऐंसिस टॉक्सिन जीन को पादपों में पहुँचा सके हैं। ऐसे पादप पीड़क द्वारा किए गए आक्रमण के प्रति प्रतिरोधी होते हैं। Bt-कॉटन इसका एक उदाहरण है जिसे हमारे देश के कुछ राज्यों में उत्पन्न किया जाता है। व्याध पतंग (ड्रैगनफ्लाई), मच्छरों और ऐफिडों आदि Bt-कॉटन को क्षति नहीं पहुंचा पाते। जैव वैज्ञानिक नियंत्रण के तहत कवक ट्राइकोडर्मा का उपयोग पादप रोगों के उपचार में किया जाता है। यह बहुत-से पादप रोगजनकों का प्रभावशील जैव नियंत्रण कारक है। बैक्यूलोवायरेसिस ऐसे रोगजनक हैं जो कीटों तथा (ऑर्थोपोडों) पर हमला करते हैं। अधिकांश बैक्यूलोवायरेसिस जो जैव वैज्ञानिक नियंत्रण कारकों की तरह प्रयोग किए जाते हैं, वे न्यूक्लिओपॉलीहीड्रोसिसवायरस जींस के अंतर्गत आते हैं। यह विषाणु प्रजाति-विशेष, सँकरे संकरे स्पैक्ट्म कीटनाशीय उपचारों के लिए अति उत्तम माने गए हैं।
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जैव उर्वरक के रूप में सूक्ष्मजीव
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अध्याय 8: मानव कल्याण में सूक्ष्मजीव - अभ्यास [पृष्ठ १७६]

APPEARS IN

एनसीईआरटी Jeev Vigyan [Hindi] Class 12
अध्याय 8 मानव कल्याण में सूक्ष्मजीव
अभ्यास | Q 10. | पृष्ठ १७६
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