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प्रश्न
निम्नलिखित पठित काव्यांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए:
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सरसुति के भंडार की, बड़ी अपूरब बात। नैना देत बताय सब, हिय को हेत-अहेत। अपनी पहुँच बिचारि कै, करतब करिए दौर। फेर न ह्वै हैं कपट सों, जो कीजै ब्यौपार। ऊँचे बैठे ना लहैं, गुन बिन बड़पन कोइ। उद्यम कबहुँ न छाँड़िए, पर आसा के मोद। |
1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए: (2)
- उपर्युक्त पद्यांश में आँखों कीं तुलना किससे की गई ?
- काम शुरू करने से पहले किस बारे में सोचना बहुत जरूरी होता है ?
- सरस्वती का भंडार अपूर्व क्यों है?
- दूसरे की आशा के भरोसे कया बंद नहीं करना चाहिए?
2. निम्नलिखित शब्दों के लिंग पहचानकर लिखिए: (2)
- सौर - ______
- नैना - ______
- पाँव - ______
- काठ - ______
3. चादर देखकर पैर फैलाना बुद्धिमानी कहलाती हैं। इस विचार पर अपना मत 40 से 50 शब्दों में व्यक्त कीजिए: (2)
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उत्तर
1.
- उपर्युक्त पद्यांश में आँखों की तुलना आईने से की गई है।
- काम शुरू करने से पहले अपनी क्षमता के बारे में सोचना बहुत जरूरी होता है।
- सरस्वती के भंडार में से जैसे खर्च किया जाता हैं वैसे ही उसमें बृद्धि होती रहती है; इसलिए सरस्वती के भंडार अपूर्व है ऐसा कहा जाता है।
- दूसरों को आशा के भरोसे कोशिश करना बद नहीं करना चाहिए।
2.
- सौर - स्त्रीलिंग
- नैना - स्त्रीलिंग
- पाँव - पुल्लिंग
- काठ - पुल्लिंग
3. चादर देखकर पैर फैलाने का अर्थ है, जितनी अपनी क्षमता हो उतने में ही काम चलाना। यह अर्थशास्त्र का साधारण नियम है। सामान्य व्यक्तियों से लेकर बड़ी-बड़ी कंपनियाँ भी इस नियम का पालन करती हैं। जो लोग इस नियम के आधार पर अपना कार्य करते हैं, उनके काम सुचारु रूप से चलते हैं। जो लोग बिना सोचे-विचारे किसी काम की शुरुआत कर देते हैं और अपनी क्षमता का ध्यान नहीं रखते, उनके सामने आगे चलकर आर्थिक संकट उपस्थित हो जाता है। इसके कारण काम ठप हो जाता है। इसलिए समझदारी इसी में है कि अपनी क्षमता का अंदाज लगाकर ही कोई कार्य शुरू किया जाए। इससे कार्य आसानी से पूरा हो जाता है। चादर देखकर पैर फैलाने में ही बुद्धिमानी होती है।
