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प्रश्न
सम्प्रेषण की किन्हीं चार मनोवैज्ञानिक बाधाओं को समझाइए।
विस्तार में उत्तर
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उत्तर
सम्प्रेषण की मनोवैज्ञानिक बाधाएँ मुख्य रूप से प्रेषक और प्राप्तकर्ता की मानसिक स्थिति और धारणाओं से संबंधित होती हैं।
- अपरिपक्व मूल्यांकन: कई बार प्राप्तकर्ता संदेश को पूरी तरह सुनने या समझने से पहले ही उसका अर्थ निकाल लेता है या उसके बारे में कोई राय बना लेता है। इस ‘पूर्व-धारणा’ के कारण संदेश का वास्तविक अर्थ खो जाता है और प्राप्तकर्ता का दिमाग नए तथ्यों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होता। इससे प्रभावी सम्प्रेषण में रुकावट आती है।
- ध्यान का अभाव: यदि प्राप्तकर्ता का मन कहीं और है या वह किसी चिंता में डूबा है, तो वह प्रेषक के संदेश पर ध्यान नहीं दे पाता। उदाहरण के लिए, यदि कोई कर्मचारी अपनी व्यक्तिगत समस्याओं के कारण परेशान है, तो वह अपने उच्चाधिकारी के निर्देशों को ठीक से नहीं सुन पाएगा। यह स्थिति सम्प्रेषण को पूरी तरह विफल बना देती है।
- अल्प धारण शक्ति: मानव मस्तिष्क की जानकारी को याद रखने की एक सीमा होती है। जब मौखिक सम्प्रेषण किया जाता है और जानकारी बहुत अधिक होती है, तो प्राप्तकर्ता समय के साथ उसका एक बड़ा हिस्सा भूल जाता है। विशेष रूप से यदि जानकारी कई स्तरों से होकर गुजरती है, तो अंतिम व्यक्ति तक पहुँचते-पहुँचते संदेश अपना मूल स्वरूप खो देता है।
- अविश्वास: प्रेषक और प्राप्तकर्ता के बीच आपसी विश्वास की कमी भी एक बड़ी मनोवैज्ञानिक बाधा है। यदि प्राप्तकर्ता को प्रेषक की नीयत पर संदेह है, तो वह संदेश को उसके सही अर्थ में नहीं लेगा। वह संदेश को नकारात्मक तरीके से देख सकता है या उसे नजरअंदाज कर सकता है। सफल सम्प्रेषण के लिए दोनों पक्षों के बीच आपसी विश्वास का होना अनिवार्य है।
ये बाधाएँ सम्प्रेषण की प्रक्रिया को जटिल बनाती हैं। इन्हें दूर करने के लिए खुले दिमाग, सक्रिय श्रवण और विश्वास का वातावरण बनाना आवश्यक है।
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