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प्रश्न
निम्नलिखित पद्यांश को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए :-
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सियार ने भेड़िए का हाथ चूम कर कहा, “बड़े भोले हैं आप सरकार! अरे मालिक, रूप-रंग बदल देने से तो सुना है आदमी तक बदल जाते हैं। फिर यह तो सियार है।” और तब, बूढ़े सियार ने भेड़िए का भी रूप बदला। मस्तक पर तिलक लगाया, गले में कंठी पहनाई और मुँह में घास के तिनके खोंस दिए। बोला, “अब आप पूरे संत हो गए।” भेड़े और भेड़िए - हरिशंकर परसाई |
- इस कहानी में भेड़िया किस का प्रतीक है? बूढ़े सियार ने भेड़िए का रूप क्यों बदला? [2]
- सियार ने भेड़िए के मुँह में घास के तिनके क्यों खोंसे? ऐसा करके वह क्या सिद्ध करना चाहता था? [2]
- सियार ने भेड़िए को किन तीन बातों का ख्याल रखने को कहा? स्पष्ट कीजिए। [3]
- वन प्रदेश के चुनाव में भेड़ों ने अपना ‘नेता’ किसे चुना? उन्होंने ‘भेड़ों’ के हित में पहला कौन सा कानून बनाया? क्या यह कानून भेड़ों के लिए हितकारी था? समझाइए। [3]
आकलन
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उत्तर
- इस कहानी में भेड़िया उन चालाक और स्वार्थी राजनेताओं का प्रतीक है जो सत्ता पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। बूढ़े सियार ने भेड़िए का रूप इसलिए बदला ताकि वह भेड़ों (भोली जनता) को धोखा दे सके। वह भेड़िए को एक ‘संत’ के रूप में पेश करना चाहता था ताकि भेड़ें उसे अपना दुश्मन न समझकर अपना रक्षक और नेता मान लें।
- सियार ने भेड़िए के मुँह में घास के तिनके इसलिए खोंसे ताकि वह शाकाहारी और अहिंसक दिखाई दे। ऐसा करके वह भेड़ों के सामने यह सिद्ध करना चाहता था कि भेड़िए ने अब हिंसा और मांस खाना छोड़ दिया है और वह पूरी तरह से बदल चुका है। इसका उद्देश्य भेड़ों के मन से भेड़िए का डर निकालना था।
- सियार ने चुनाव प्रचार के दौरान भेड़िए को इन तीन मुख्य बातों का पालन करने की सलाह दी थी:
- अपनी आँखों को हमेशा नीचा रखना, ताकि वह विनम्र और दयालु दिखाई दे।
- चुनाव के दौरान बिल्कुल न बोलना, क्योंकि बोलने पर उसकी डरावनी आवाज़ उसकी असलियत खोल सकती थी।
- हमेशा परम गंभीर और शांत मुद्रा बनाए रखना, ताकि लोग उसे एक सच्चा महात्मा और पहुँचा हुआ संत समझें।
- वन प्रदेश के चुनाव में भेड़ों ने सियारों के बहकावे में आकर भेड़ियों को ही अपना नेता चुना। सत्ता में आते ही भेड़ियों ने भेड़ों के ‘कल्याण’ के लिए पहला कानून यह बनाया कि-“हर भेड़िए को सुबह के नाश्ते में एक मुलायम भेड़ का बच्चा, दोपहर के भोजन में एक पूरी भेड़ और रात को स्वास्थ्य की दृष्टि से आधी भेड़ दी जाए।” यह कानून भेड़ों के लिए बिल्कुल भी हितकारी नहीं था। यह कानून असल में भेड़ों के विनाश का फरमान था, जो यह दर्शाता है कि कैसे भ्रष्ट नेता जनता की भलाई के नाम पर केवल अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं।
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