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प्रश्न
निम्नलिखित गद्यांश को पढ़िए और उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए :-
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सेठ बड़े आश्चर्य में पड़े - महायज्ञ! और आज। वे समझे कि उनका मजाक उड़ाया जा रहा है। विनम्र भाव से बोले, “आप आज की कहती हैं, मैंने तो बरसों से कोई यज्ञ नहीं किया है। मेरी स्थिति ही ऐसी नहीं थी।” महायज्ञ का पुरस्कार - यशपाल |
- सेठ जी कहाँ गए थे? उन दिनों कौन सी प्रथा प्रचलित थी? [2]
- किसके कथन को सुनकर सेठ को ऐसा लगा कि उनका मजाक उड़ाया जा रहा है और क्यों? [2]
- सेठानी ने सेठजी के किस कार्य को महायज्ञ कहा था तथा सेठ ने अपने कार्य को महायज्ञ क्यों नहीं माना? इस कार्य से सेठ जी के स्वभाव की कौन सी विशेषता स्पष्ट होती है? [3]
- ‘महायज्ञ का पुरस्कार’ कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है ? इस कहानी का कौन सा पात्र आपको अपने किन गुणों के कारण सबसे अच्छा लगा? [3]
आकलन
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उत्तर
- सेठ जी बहुत दूर स्थित कुंदनपुर के एक धनी सेठ (धन्ना सेठ) के यहाँ अपना एक ‘यज्ञ’ बेचने गए थे। उन दिनों यह प्रथा प्रचलित थी कि यज्ञों के पुण्यों का क्रय-विक्रय (खरीदना और बेचना) किया जा सकता था।
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कुंदनपुर के धन्ना सेठ की पत्नी (सेठानी), जिनके बारे में यह अफवाह थी कि उन्हें कोई दैवीय शक्ति प्राप्त है, की बात सुनकर सेठ जी को लगा कि उनका मजाक उड़ाया जा रहा है। जब सेठानी ने उनसे कहा कि वे अपना आज वाला ‘महायज्ञ’ बेच दें, तो सेठ चकित रह गए क्योंकि उन्होंने बरसों से कोई यज्ञ नहीं किया था। उन्हें लगा कि उनकी गरीबी का उपहास किया जा रहा है।
- सेठानी ने सेठ जी द्वारा रास्ते में स्वयं भूखे रहकर अपनी चारों रोटियाँ एक मरणासन्न और भूखे कुत्ते को खिला देने के कार्य को ‘महायज्ञ’ कहा था। और सेठ ने इसे महायज्ञ इसलिए नहीं माना क्योंकि उनके अनुसार एक भूखे जीव को भोजन कराना केवल उनका मानवीय कर्तव्य था, कोई यज्ञ नहीं। इसलिए यह कार्य से सेठ जी की निस्वार्थ परोपकारिता, दयालुता, जीव-प्रेम और उनके अहंकार-रहित स्वभाव की विशेषता स्पष्ट होती है।
- यह कहानी हमें शिक्षा देती है कि वास्तविक यज्ञ वह नहीं है जो आडंबर या धन खर्च करके किया जाए, बल्कि वह निस्वार्थ सेवा और त्याग है जो बिना किसी फल की इच्छा के किसी मजबूर प्राणी की सहायता के लिए किया जाता है। सच्चा पुण्य निस्वार्थ कर्म में ही निहित है। इस कहानी में सेठ जी का पात्र सबसे अच्छा लगा क्योंकि विपरीत परिस्थितियों और अत्यधिक गरीबी में भी उन्होंने अपना धर्म नहीं छोड़ा। उनकी करुणा इतनी गहरी थी कि उन्होंने अपनी भूख की चिंता न कर एक मूक प्राणी का जीवन बचाना श्रेष्ठ समझा।
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