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रैदास के जीवन और पदों के विषय में पुस्तकालय और इंटरनेट से खोजकर पढ़िए। कुछ लिंक नीचे दिए गए हैं। https://youtu.be/zZoAghETdgI https://youtu.be/0vfpBMozOXY

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प्रश्न

रैदास के जीवन और पदों के विषय में पुस्तकालय और इंटरनेट से खोजकर पढ़िए। कुछ लिंक नीचे दिए गए हैं।

https://youtu.be/zZoAghETdgI

https://youtu.be/0vfpBMozOXY

कृति
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उत्तर

संत रैदास 15वीं शताब्दी के महान संत कवि थे, जिनका जन्म काशी (वाराणसी) के निकट माना जाता है। वे भक्ति आंदोलन के प्रमुख संतों में गिने जाते हैं और निर्गुण भक्ति धारा के समर्थक थे।

उनका जन्म चर्मकार समुदाय में हुआ था, लेकिन उन्होंने समाज में मौजूद जाति-पाति और ऊँच-नीच के भेदभाव का विरोध किया। उनका मानना था कि ईश्वर सभी के लिए समान हैं और उन्हें प्राप्त करने के लिए किसी भी प्रकार के भेदभाव की जरूरत नहीं है।

रैदास की शिक्षाएँ और विचार

  • रैदास के अनुसार ईश्वर निराकार हैं और प्रत्येक जीव में निवास करते हैं।
  • उनके मत में प्रेम, श्रद्धा और पूर्ण समर्पण ही सच्ची भक्ति के आधार हैं।
  • उन्होंने कर्मकांड, तीर्थयात्रा और व्रत जैसे बाहरी दिखावों को महत्वहीन माना।
  • उनका विश्वास था कि सभी मनुष्य बराबर हैं और जाति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए।
  • उन्होंने “बेगमपुरा” नामक एक ऐसे आदर्श समाज की कल्पना की, जहाँ किसी प्रकार का दुःख या भेदभाव न हो।

रैदास के पदों की विशेषताएँ

  • उनके पद भक्त और परमात्मा के गहरे तथा अटूट संबंध को व्यक्त करते हैं।
  • भक्ति की भावना को समझाने के लिए उन्होंने अनेक सुंदर उदाहरण दिए हैं, जैसे-
    • चंदन–पानी
    • दीपक–बाती
    • मोती–धागा
    • बादल–मोर
  • उनकी रचनाओं में सरल एवं जनसामान्य की भाषा (ब्रजभाषा) का प्रयोग मिलता है।
  • पदों में अनुप्रास, उपमा तथा रूपक जैसे अलंकारों का प्रभावशाली उपयोग हुआ है।
  • उनकी भक्ति भावनात्मक, सहज और प्रेम से परिपूर्ण है।

रैदास के जीवन और उनकी रचनाएँ हमें यह संदेश देती हैं कि ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग कर्मकांडों से नहीं, बल्कि सच्ची भक्ति, प्रेम और समानता की भावना से प्रशस्त होता है।

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अध्याय 8: पद - अभ्यास [पृष्ठ १५२]

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एनसीईआरटी Hindi Ganga Class 9
अध्याय 8 पद
अभ्यास | Q 1. | पृष्ठ १५२
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