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नर-समाज का भाग्य एक है, वह श्रम है, वह भुजबल है, जिसके सम्मुख झुकी हुई पृथिवी, विनीत नभ-तल है। जिसने श्रम-जल दिया, उसे पीछे मत रह जानें दो, विजित प्रकृति से सबसे पहले उसको सुख पाने दो। - Hindi (Indian Languages)

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प्रश्न

नर-समाज का भाग्य एक है, वह श्रम है, वह भुजबल है,
जिसके सम्मुख झुकी हुई पृथिवी, विनीत नभ-तल है।
जिसने श्रम-जल दिया, उसे पीछे मत रह जानें दो,
विजित प्रकृति से सबसे पहले उसको सुख पाने दो।
  1. प्रस्तुत पंक्तियों से सम्बन्धित कविता तथा कवि का नाम लिखिए।     [1]
  2. कवि नें ‘नर समाज का भाग्य’ किसे कहा है और क्यों?     [2]
  3. कवि की दृष्टि में सबसे पहले सुख पाने का अधिकारी कौन है और क्यों? समझाकर लिखिए।     [2]
  4. ‘उसे पीछे मत रह जाने दो’ - पंक्ति के आधार पर बताइए कि यदि वह व्यक्ति पीछे रह गया तो क्या परिणाम होगा? किन्हीं दो तर्कों द्वारा अपनी बात स्पष्ट कीजिए।     [5]
आकलन
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उत्तर

i. प्रस्तुत पंक्तियाँ ‘उद्यमी नर’ कविता से संबंधित हैं, जिसके रचयिता राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हैं।

ii. मेहनती व्यक्ति को ही नर समाज का भाग्य कहा गया है, क्योंकि उसने अपने परिश्रम के बल पर प्रकृति और संसार पर विजय प्राप्त की है। संसार में सबसे पहले सुख पाने का अधिकार भी उसी परिश्रमी व्यक्ति को है और उसी के सामने पृथ्वी तक झुक सकती है।

iii. कवि के अनुसार संसार में सबसे पहले सुख प्राप्त करने का अधिकार उसी मेहनती व्यक्ति को है, और उसी के सामने पृथ्वी झुक सकती है, क्योंकि उसने अपने परिश्रम के बल पर प्रकृति और पूरे संसार पर विजय हासिल की है।

iv. “उसे पीछे मत रह जाने दो” से कवि का आशय यह है कि समाज के शोषित, वंचित और पिछड़े वर्ग को आगे बढ़ने का अवसर दिया जाए और उन्हें पीछे ही न रहने दिया जाए। शासन और समाज दोनों का दायित्व है कि ऐसे लोगों को समाज की मुख्य धारा से जोड़ा जाए, क्योंकि यदि कोई व्यक्ति पीछे रह जाता है तो उसके परिणाम नकारात्मक हो सकते हैं। यह पंक्ति प्रेरणा देती है कि व्यक्ति को निरंतर प्रगति का प्रयास करना चाहिए, अन्यथा वह जीवन की प्रतिस्पर्धा में पिछड़ सकता है। ‘उद्यमी नर’ पाठ के अनुसार आलस्य या भय के कारण पीछे रहने वाला व्यक्ति सफलता प्राप्त नहीं कर पाता।

पिछड़े वर्ग के पीछे रह जाने के संभावित परिणाम:

  1. अवसरों से वंचित होना: जो व्यक्ति समय रहते प्रयास नहीं करता, वह उपलब्ध अवसरों का लाभ नहीं उठा पाता।
  2. प्रतिस्पर्धा में पिछड़ना: समाज और कार्यक्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए निरंतर परिश्रम आवश्यक होता है।
  3. आत्मविश्वास में कमी: बार-बार असफलता मिलने पर व्यक्ति का आत्मविश्वास कमजोर पड़ सकता है।
    ‘उद्यमी नर’ पाठ यह शिक्षा देता है कि वही व्यक्ति सफल होता है जो कठिन परिश्रम और सतत प्रयास करता है। इसलिए पीछे रहने के बजाय निरंतर आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए।
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