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प्रश्न
‘कबीर की साखियों में गुरु का महत्त्व, जीवात्मा-परमात्मा का सम्बन्ध तथा अज्ञानता रूपी अंधकार से ज्ञानरूपी प्रकाश की ओर अग्रसित करने को विधान मिलता है।’ पठ़ित साखियों के आधार पर इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
स्पष्ट कीजिए
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उत्तर
कबीर की साखियों में गुरु के महत्व, जीवात्मा और परमात्मा के संबंध तथा ज्ञान की महत्ता का स्पष्ट वर्णन मिलता है। कबीरदास जी भारतीय संत परंपरा के महान कवि थे, जिन्होंने अपनी साखियों के माध्यम से जीवन के गूढ़ रहस्यों को सरल और सहज भाषा में व्यक्त किया। उनकी साखियाँ अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ने का सशक्त संदेश देती हैं।
- गुरु का महत्त्व: कबीरदास जी ने गुरु को परमात्मा से भी उच्च स्थान प्रदान किया है। उनके अनुसार गुरु ही वह प्रकाश है, जो अज्ञान के अंधकार को दूर कर मनुष्य को ज्ञान के मार्ग पर ले जाता है। गुरु को उन्होंने जीवन का सच्चा पथप्रदर्शक माना है, जो शिष्य को सत्य का बोध कराता है। इस भाव को उनकी प्रसिद्ध साखी में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है-
“गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय॥”
इस साखी के माध्यम से कबीरदास जी बताते हैं कि यदि गुरु और गोविंद दोनों एक साथ उपस्थित हों, तो पहले गुरु के चरणों में प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि गुरु ही ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग दिखाता है। गुरु की कृपा से ही मनुष्य सही और गलत का विवेक प्राप्त करता है तथा आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में आगे बढ़ता है। गुरु के बिना आत्मज्ञान की प्राप्ति संभव नहीं है। - जीवात्मा-परमात्मा का सम्बन्ध: कबीरदास जी की साखियों में जीवात्मा और परमात्मा के गहरे संबंध का वर्णन मिलता है। उनके अनुसार आत्मा वास्तव में परमात्मा का ही अंश है, किंतु माया और अज्ञान के कारण वह उससे अलग-थलग हो जाती है। जब आत्मा माया के बंधनों से मुक्त हो जाती है, तब परमात्मा से उसका मिलन संभव हो जाता है। इस भाव को कबीर ने अपनी साखी में इस प्रकार व्यक्त किया है-
“जल में कुंभ, कुंभ में जल है, बाहर भीतर पानी।
फूटा कुंभ जल जल ही समाना, यह तथ कहै ज्ञानी॥”
इस साखी में कबीरदास जी ने जल और घड़े के माध्यम से जीवात्मा और परमात्मा के संबंध को स्पष्ट किया है। जब तक घड़ा अर्थात शरीर विद्यमान है, तब तक जल रूपी आत्मा उसमें सीमित रहती है, किंतु घड़े के टूटने पर जल जल में मिल जाता है। इसी प्रकार शरीर के नष्ट होने पर आत्मा परमात्मा में लीन हो जाती है।
कबीरदास जी के अनुसार यह संसार माया का जाल है, जिससे मुक्त होने के लिए आत्मज्ञान आवश्यक है। जब व्यक्ति माया से ऊपर उठकर सत्य की खोज करता है, तभी उसे परमात्मा का साक्षात्कार प्राप्त होता है। - अज्ञानता से ज्ञान की ओर यात्रा: कबीरदास जी के अनुसार अज्ञान ही मनुष्य के दुःखों का मूल कारण है। जब तक व्यक्ति अज्ञान के अंधकार में भटकता रहता है, तब तक वह जीवन के वास्तविक उद्देश्य को नहीं समझ सकता। इस भाव को व्यक्त करती उनकी एक प्रसिद्ध साखी है-
“माला फेरत जुग गया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर॥”
इस साखी के माध्यम से कबीर यह स्पष्ट करते हैं कि केवल बाहरी आडंबर और दिखावा आत्मज्ञान नहीं दिला सकता। सच्चा ज्ञान तभी प्राप्त होता है जब मनुष्य अपने भीतर झाँककर आत्मचिंतन करता है। अज्ञान को दूर करने के लिए सत्संग, गुरु की कृपा और आत्ममंथन आवश्यक हैं। कबीरदास जी का मूल संदेश यही है कि व्यक्ति को बाहरी कर्मकांडों से हटकर वास्तविक ज्ञान की दिशा में अग्रसर होना चाहिए।
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