Advertisements
Advertisements
प्रश्न
निम्न परिच्छेद पढ़कर इसके नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए:
| महाराष्ट्र में बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी में निर्मित मंदिरों को ‘हेमाड़पंती मंदिर’ कहते हैं। हेमाड़पंती मंदिर की बाहरी दीवारें प्रायः तारकाकृति होती हैं। तारकाकृति मंदिर की बनावट में मंदिर की बाह्य दीवार अनेक कोणों में विभाजित हो जाती है। अतः उन दीवारों और उन पर बने शिल्पों पर छायाप्रकाश का सुंदर प्रभाव देखने को मिलता है। हेमाड़ ती मंदिरों की महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि दिवारों के पत्थर जोड़ने के लिए चूने का उपयोग नहीं किया जाता। पत्थरों में ही एकदूसरे में कसकर फँसेंगे ऐसे खरादे हुए छेद में चूल बिठाकर उसके सहारे दीवार खड़ी की जाती है। मुंबई के समीपस्थ अंबरनाथ का अंब्रेश्वर, नाशिक के समीप सिन्नर का गोंदेश्वर, हिंगोली जिले में औंढा नागनाथ हेमाड़ ती मंदिर के उत्तम उदाहरण हैं। इन मंदिरों की बनावट तारकाकृति प्रकार की है। इनके अतिरिक्त महाराष्ट्र में अनेक स्थानों पर हेमाड़पंती मंदिर देखने को मिलते हैं। |
प्रश्न:
- हेमाड़पंती मंदिरों की बाहरी दीवारें कैसी होती है? (1)
- हेमाड़पंती मंदिरों के कुछ उदाहरण लिखिए। (1)
- हेमाड़पंती मंदिरों की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ बताइए। (2)
विस्तार में उत्तर
Advertisements
उत्तर
- हेमाड़पंती मंदिरों की बाहरी दीवारें प्रायः तारकाकृति होती हैं।
- मुंबई के समीपस्थ अंबरनाथ का अंब्रेश्वर, नाशिक के समीप स्थित सिन्नर का गोंदेश्वर तथा हिंगोली जिले में स्थित औंढा नागनाथ हेमाड़पंती मंदिर के उत्तम उदाहरण हैं।
-
- हेमाडपंती मंदिर की तारकाकृति बाहरी दीवारें कई हिस्सों में विभाजित होती हैं।
- इसके कारण मंदिरों की तारकाकृति दीवारों और उन पर बनी मूर्तियों पर छायाप्रकाश का सुंदर प्रभाव दिखाई देता है।
- पत्थरों से बनी दीवारों पर देवी-देवताओं की उकेरी हुई मूर्तियाँ पाई जाती हैं।
- इन मंदिरों की महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि दीवारों के पत्थर जोड़ने के लिए ईंट का प्रयोग नहीं किया जाता, बल्कि पत्थरों को एक-दूसरे में जोड़ने के लिए उनमें खुरदरे छेद बनाकर चूल रखकर उसके सहारे दीवार खड़ी की जाती है।
shaalaa.com
क्या इस प्रश्न या उत्तर में कोई त्रुटि है?
