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प्रश्न
“कैसे कहूँ मनुष्यता एकदम समाप्त हो गई! कैसे कहूँ, कि लोगों में दया-माया रह ही नहीं गई! जीवन में न जाने कितनी ऐसी घटनाएँ हुई हैं, जिन्हें मैं कमी भूल नहीं सकता। ठगा भी गया हूँ, धोखा भी खाया है परन्तु बहुत कम स्थलों पर विश्वासघात नाम की चीज़ मिली है।
- प्रस्तुत पंक्तियों से सम्बन्धित पाठ तथा उसके लेखक का नाम लिखिए। [1]
- “कैसे कहूँ, मनुष्यता एकदम समाप्त हो गई”-यह पंक्ति किसने कही है? यह पंक्ति लेखक ने किन दो घटनाओं को ध्यान में रखकर कही? संक्षिप्त उत्तर दीजिए। [2]
- लेखक ने स्वीकार किया है कि लोगों ने उन्हें भी धोखा दिया है फिर भी वे निराश नहीं हैं क्यों? पाठ के आधारपर स्पष्ट कीजिए। [4]
विस्तार में उत्तर
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उत्तर
- प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के गद्य–संग्रह में संकलित “क्या निराश हुआ जाए” नामक निबंध से ली गई हैं। इस निबंध के लेखक प्रसिद्ध साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं।
- ये पंक्तियाँ स्वयं लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा कही गई हैं। इन पंक्तियों में लेखक ने रेल टिकट बाबू और बस कंडक्टर के व्यवहार का उल्लेख करते हुए उनकी लापरवाही और ईमानदारी की कमी को उजागर किया है। लेखक बताता है कि ऐसे अनुभव उसे पहले भी कई बार हुए हैं और वह अब उनसे अधिक चकित नहीं होता।
- लेखक का दृष्टिकोण आशावादी है। उनका मानना है कि यद्यपि समाज में कुछ लोग स्वार्थवश छल, धोखा और बेईमानी का सहारा लेते हैं, फिर भी उन्हें यह विश्वास है कि जब तक लोगों के हृदय में सत्य, प्रेम, ईमानदारी और सहानुभूति जैसे मानवीय मूल्य जीवित हैं, तब तक उनके सपनों का आदर्श भारत उनकी आशा का केंद्र बना रहेगा। इसी कारण लेखक धोखाधड़ी जैसी घटनाओं से पूरी तरह निराश नहीं होता।
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