Advertisements
Advertisements
प्रश्न
ज़रूरत-भर जीरा वहाँ से ले लिया कि फिर सारा चौक उनके लिए आसानी से नहीं के बराबर हो जाता है- भगत जी की इस संतुष्ट निस्पृहता की कबीर की इस सूक्ति से तुलना कीजिए-
|
चाह गई चिंता गई मनुआँ बेपरवाह
जाके कछु न चाहिए सोइ सहंसाह। -कबीर
|
लघु उत्तरीय
Advertisements
उत्तर
कबीर जी का यह दोहा भगत जी की संतोषपूर्ण और इच्छारहित प्रवृत्ति पर पूरी तरह लागू होता है। उनका मानना था कि इच्छाओं के समाप्त होने से चिंताएँ भी समाप्त हो जाती हैं। वास्तविक शहंशाह वही है जिसे किसी चीज़ की आवश्यकता नहीं होती। भगत जी भी ऐसे ही व्यक्ति हैं। उनकी आवश्यकताएँ सीमित हैं और वे बाज़ार के आकर्षण से प्रभावित नहीं होते। अपनी जरूरत पूरी होने पर वे संतुष्ट हो जाते हैं।
shaalaa.com
व्याकरण
क्या इस प्रश्न या उत्तर में कोई त्रुटि है?
