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एक चित्र और एक लिखित पाठ को चुनकर किन्हीं दो स्रोतों की पड़ताल कीजिए और इस बारे में चर्चा कीजिए। कि उनसे विजेताओं और पराजितों के दृष्टिकोण के बारे में क्या पता चलता है?

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प्रश्न

एक चित्र और एक लिखित पाठ को चुनकर किन्हीं दो स्रोतों की पड़ताल कीजिए और इस बारे में चर्चा कीजिए। कि उनसे विजेताओं और पराजितों के दृष्टिकोण के बारे में क्या पता चलता है?

दीर्घउत्तर
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उत्तर

यदि हम प्रस्तुत अध्ययन में दिए गए एक चित्र और एक लिखित पाठ का चुनाव करके उनका परीक्षण करते हैं, तो उनसे पता लगता है कि विद्रोह के विषय में विजेताओं अर्थात् अंग्रेज़ों और पराजितों अर्थात् भारतीयों के दृष्टिकोण में भिन्नता थी।

  1. उदाहरण के लिए, यदि हम ऊपर दिए गए चित्र का परीक्षण करते हैं, तो स्पष्ट हो जाता है कि अंग्रेजों ने जिस संघर्ष को ‘एक सैनिक विद्रोह मात्र’ कहा भारतीयों के लिए ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध छेड़ा गया भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम था। इसका प्रमुख उद्देश्य देश को विदेशी प्रभुत्व से मुक्त करवाना था। झाँसी में विद्रोह का नेतृत्व रानी लक्ष्मीबाई ने किया। इस चित्र में रानी लक्ष्मीबाई को वीरता की साकार प्रतिमा के रूप में चित्रित किया गया है। उल्लेखनीय है कि झाँसी में महिलाओं ने पुरुषों के वेश में अस्त्र-शस्त्र धारण कर ब्रिटिश सैनिकों का डटकर मुकाबला किया। रानी लक्ष्मीबाई शत्रुओं का पीछा करते हुए, ब्रिटिश सैनिकों को मौत के घाट उतारते हुए निरंतर आगे बढ़ती रही और अंत में मातृभूमि के लिए अपने प्राणों की बलि दे दी। लक्ष्मीबाई की यह वीरता देशभक्तों के लिए एक प्रेरणा का स्रोत बन गई। चित्रों में रानी को वीरता की साकार प्रतिमा के रूप में चित्रित किया गया तथा उनकी वीरता की सराहना में अनेक कविताओं की रचना की गई। लोक छवियों में झाँसी की यह रानी अन्याय एवं विदेशी सत्ता के दृढ़ प्रतिरोध की प्रतीक बन गई। रानी की वीरता का गौरवगान करते हुए सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा लिखी गई ये पंक्तियाँ “खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी” देश के बच्चे-बच्चे की जुबाँ पर आ गईं।
  2. पाठ्यपुस्तक में दिए गए इस स्रोत (स्रोत-7), “अवध के लोग उत्तर से जोड़ने वाली संचार लाइन पर जोर बना रहे हैं… अवध के लोग गाँव वाले हैं…। ये यूरोपीयों की पकड़ से बिलकुल बाहर हैं। पलभर में बिखर जाते हैं : पलभर में फिर जुट जाते हैं; शासकीय अधिकारियों का कहना है कि इन गाँव वालों की संख्या बहुत बड़ी है और उनके पास बाकायदा बंदूकें हैं।” के परीक्षण से पता चलता है कि अवध में इस विद्रोह का व्यापक प्रसार हुआ था और यह विदेशी शासन के विरुद्ध लोक-प्रतिरोध की अभिव्यक्ति बन गया था। उल्लेखनीय है कि इस क्षेत्र में ब्रिटिश शासन ने राजकुमारों, ताल्लुकदारों, किसानों एवं सिपाहियों सभी को समान रूप से प्रभावित किया था। सभी ने अवध में बिटिश शासन की स्थापना के परिणामस्वरूप अनेक प्रकार की पीड़ाओं को अनुभव किया था। सभी के लिए अवध में ब्रिटिश शासन का आगमन एक दुनिया की समाप्ति का प्रतीक बन गया था। जो चीजें लोगों को बहुत प्रिय थीं, वे उनकी आँखों के सामने ही छिन्न-भिन्न हो रही थीं।
    1857 ई० का विद्रोह मानो उनकी सभी भावनाओं, मुद्दों, परम्पराओं एवं निष्ठाओं की अभिव्यक्ति का स्रोत बन गया था। अवध में ताल्लुकदारों को उनकी सत्ता से वंचित कर दिए जाने के कारण एक संपूर्ण सामाजिक व्यवस्था नष्ट हो गई थी। किसानों को ताल्लुकदारों के साथ बाँधने वाले निष्ठा और संरक्षण के बंधन नष्ट-भ्रष्ट हो गए थे। उल्लेखनीय है कि 1857 ई० में अवध के जिन-जिन क्षेत्रों में ब्रिटिश शासन को कठोर प्रतिरोध का सामना करना पड़ा, वहाँ-वहाँ संघर्ष की वास्तविक बागडोर ताल्लुकदारों एवं किसानों के हाथों में थी। हमें याद रखना चाहिए कि अधिकांश सैनिकों का संबंध किसान परिवारों से था। यदि सिपाही अपने अफसरों के आदेशों की अवहेलना करके शस्त्रे उठा लेते थे, तो तत्काल ही उन्हें ग्रामों से अपने भाई-बंधुओं को सहयोग प्राप्त हो जाता था। इस प्रकार अवध में विद्रोह का व्यापक प्रसार हुआ। इस विद्रोह में किसानों ने सिपाहियों के कंधे-से-कंधा मिलाकर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष किया।
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विद्रोह का ढर्रा
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अध्याय 11: विद्रोही और राज - अभ्यास [पृष्ठ ३१५]

APPEARS IN

एनसीईआरटी Itihas Bhag 1, 2 aur 3 [Hindi] Class 12
अध्याय 11 विद्रोही और राज
अभ्यास | Q 9. | पृष्ठ ३१५
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