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प्रश्न
“आः धरती कितना देती है” में कवि ने बचपन में और वर्षों बाद बड़े होकर क्या बोया था? दोनों परिस्थितियों में क्या परिणाम हुआ? इसके माध्यम से कवि ने क्या संदेश देना चाहा है? समझाकर लिखिए।
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उत्तर
‘सुमित्रानन्दन पन्त’ प्रकृति के कोमल और संवेदनशील कवि माने जाते हैं। उन्होंने यह विचार प्रस्तुत किया है कि धरती हमें कितना देती है, इसका सही अनुमान लगाना कठिन है, क्योंकि वह हमारी अपेक्षा से कहीं अधिक प्रदान करती है। प्रस्तुत पद्य में कवि यह कहना चाहता है कि यदि हम लोभ से प्रेरित होकर धरती में कुछ बोते हैं, तो उसका परिणाम शून्य ही निकलता है। इसके विपरीत, यदि अनजाने में भी हम मानव-कल्याण और समानता के बीज बो देते हैं, तो वे आगे चलकर सुंदर और समृद्ध परिणाम देते हैं। इस पद्य में कवि ने दो घटनाओं के माध्यम से अपने विचार स्पष्ट किए हैं:
- एक अवसर पर कवि ने दूसरों की दृष्टि से छिपाकर, लोभवश भूमि में पैसे बो दिए। उसे यह कल्पना थी कि उनसे पैसों का वृक्ष उगेगा, जिस पर ढेर सारे नोट फल के रूप में लगेंगे। इस कल्पना से वह अत्यंत उत्सुक और बेचैन था, लेकिन लंबे समय तक प्रतीक्षा करने के बाद भी एक भी पौधा अंकुरित नहीं हुआ। वर्षों बाद कवि को यह समझ में आया कि उसने उस समय भारी भूल की थी।
- दूसरी घटना में वर्षा ऋतु के आगमन पर, कवि ने अपने घर के आँगन के एक कोने में अनायास ही बीज बो दिए। बाद में वह इस बात को पूरी तरह भूल गया और उसे कभी विशेष महत्व भी नहीं दिया। लेकिन कुछ समय बाद उन बीजों से अंकुर निकल आए। धीरे-धीरे वे पौधे फैलते गए, पूरे आँगन में बेलें फैल गईं और उन पर बहुत अधिक फलियाँ लग गईं, जो उसकी अपेक्षा से कहीं अधिक थीं।
इन दोनों घटनाओं की तुलना से यह स्पष्ट होता है कि हमें अपने स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि समाज और मानव-कल्याण को ध्यान में रखकर कर्म करने चाहिए। ऐसे कार्यों का परिणाम इतना सुखद होता है कि चारों ओर प्रसन्नता फैल जाती है। वास्तव में, जीवन में यह सिद्धांत पूर्ण रूप से सत्य है कि हम जैसा बोते हैं, वैसा ही फल प्राप्त करते हैं।
