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1960 के दशक की कांग्रेस पार्टी के संदर्भ में 'सिंडिकेट' का क्या अर्थ है? सिंडिकेट ने कांग्रेस पार्टी में क्या भूमिका निभाई? - Political Science (राजनीति विज्ञान)

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प्रश्न

1960 के दशक की कांग्रेस पार्टी के संदर्भ में 'सिंडिकेट' का क्या अर्थ है? सिंडिकेट ने कांग्रेस पार्टी में क्या भूमिका निभाई?

संक्षेप में उत्तर
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उत्तर

कांग्रेस पार्टी में सिंडिकेट - 1960 के दशक में कांग्रेस पार्टी के संगठनात्मक ढाँचे में कुछ प्रमुख नेताओं का एक समूह उभरकर आया था और कांग्रेस के सभी निर्णयों तथा गतिविधियों पर उस समूह की छाप पड़ने लगी थी। वह एक प्रकार से किंग मेकर के समान था। इसी समूह को अनौपचारिक रूप से सिंडिकेट कहा जाता था। कांग्रेस पार्टी के संविधान में इसकी कोई व्यवस्था नहीं थी और सभी निर्णय पार्टी संविधान के अनुसार लोकतान्त्रिक तरिके से होने चाहिए थे इस समूह के प्रमुख नेता थे के. कामराज (मद्रास), बंबई के एस. के. पाटिल, मैसूर के यस. निजलिंगप्पा, पशिचमी बंगाल के अतुल्य घोष, आंध्रा प्रदेश के.एन. संजीवा रेड्डी। धीरे - धीरे इस समूह का दबदबा बढ़ता गया। नेहरू की मृत्यु के बाद लाल बहादुर शास्त्री को और उनकी मृत्यु के बाद इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री बनवाने में इसने ही अहम भूमिका निभाई थी। सिंडिकेट इतना प्रभावी होने लगा था की प्रधानमंत्री का स्वतंत्रतापूर्वक काम करना कठिन था और सिंडिकेट चाहता था की प्रधनमंत्री उससे सलाह लेकर मंत्रिपरिषद का गठन करे और शासन की नीतियाँ अपनाए। 1969 में राष्ट्रपति के चुनाव में इस समूह ने इंदिरा गाँधी की असहमति के बावजूद संजीवा रेड्डी को राष्ट्रपति पद के लिए कांग्रेस उम्मीदवार नामांकित करवा दिया। इंदिरा गाँधी ने इस चुनौती को स्वीकार किया और कांग्रेस के उम्मीदवार के विरुद्ध वी. वी. गिरी को स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में खड़ा करवा दिया तथा इसे निर्वाचित करवा दिया। सिंडिकेट ने अनुशासन हीनता का आरोप लगाकर इंदिरा गाँधी को दल से निकाल दिया, जिस पर कांग्रेस का विभाजन हुआ। 1971 के चुनाव में इसको एक और झटका लगा जब की इसे कुल 16 स्थान मिले। सिंडिकेट कांग्रेस के विभाजन का कारण बनी और उसकी अपनी भी समाप्ति हुई।

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कांग्रेस में विभाजन
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