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प्रश्न
तीर्थ और व्रत के स्थान पर रैदास ने आराध्य की भक्ति को प्रधान माना है। भक्तिकाल के कवि रैदास की तरह कबीर भी निराकार आराध्य की भक्ति पर बल देते हैं। तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों के आधार पर बताइए कि इसके क्या कारण हो सकते हैं?
(संकेत – आप अपने सामाजिक विज्ञान के शिक्षक की सहायता भी ले सकते हैं।)
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उत्तर
रैदास के समय में भक्ति आंदोलन अपने चरम पर था और पूरे भारत में भक्ति की भावना व्यापक रूप से फैली हुई थी। उस काल में एक ओर इस्लाम के प्रभाव के कारण मंदिरों को नुकसान पहुँचाया जा रहा था और मूर्ति-पूजा का विरोध किया जा रहा था, वहीं दूसरी ओर धर्म के क्षेत्र में व्रत, उपवास, तीर्थयात्रा और पूजा-पाठ जैसे अनेक आडंबर भी प्रचलित थे। ऐसे चुनौतीपूर्ण वातावरण में संत साहित्य का विकास हुआ। संत कवियों ने हिंदू भक्ति परंपरा को बाहरी आक्रमणों और सामाजिक रूढ़ियों से बचाने का प्रयास किया तथा निर्गुण भक्ति का एक नया मार्ग प्रस्तुत किया। इसी कारण रैदास के ‘राम’ पारंपरिक राम न होकर निराकार ब्रह्म के रूप में सामने आते हैं। इस स्वरूप से न तो मुस्लिम शासकों को आपत्ति थी और न ही हिंदुओं की भक्ति प्रभावित होती थी। इस प्रकार यह मार्ग कठिन परिस्थितियों में संतों द्वारा खोजा गया एक संतुलित और सार्थक समाधान था।
