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प्रश्न
निचे दिए गए विषय पर निबन्ध लिखिए जो लगभग 400 शब्दों से कम न हो:
निम्नलिखित विषय पर मौलिक कहानी लिखिए:
“बीती ताहि बिसार दे आगे की सुध लेय।”
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उत्तर
बीती ताहि बिसार दे आगे की सुध लेय
प्रस्तावना
मानव जीवन सुख-दुख, सफलता और विफलता का एक अनवरत चक्र है। अक्सर हम अपनी पिछली गलतियों या दुखों को याद कर वर्तमान को भी व्यर्थ कर देते हैं। हिंदी साहित्य की यह प्रसिद्ध उक्ति “बीती ताहि बिसार दे आगे की सुध लेय” हमें यही सिखाती है कि जो बीत गया उसे भुलाकर भविष्य को संवारने पर ध्यान देना चाहिए। इसी भाव को चरितार्थ करती एक मौलिक कहानी नीचे दी गई है।
कहानी: एक नई शुरुआत
रामपुर गाँव में सोहन नाम का एक कुम्हार रहता था। वह मिट्टी के बर्तन बनाने की कला में निपुण था, लेकिन उसका स्वभाव बहुत ही निराशावादी था। दो साल पहले एक बड़ी प्रदर्शनी के लिए उसने रात-दिन एक करके सैकड़ों कलात्मक बर्तन तैयार किए थे। दुर्भाग्यवश, शहर ले जाते समय बैलगाड़ी पलट गई और उसके सारे बर्तन चकनाचूर हो गए। उस दुर्घटना ने सोहन को मानसिक रूप से तोड़ दिया।
वह दिनभर अपने टूटे हुए बर्तनों के टुकड़ों को देखता और अपनी किस्मत को कोसता रहता। उसने चाक (मिट्टी का पहिया) चलाना छोड़ दिया। देखते ही देखते उसकी आर्थिक स्थिति खराब होने लगी। उसकी पत्नी और बच्चे दाने-दाने को तरसने लगे, लेकिन सोहन बस यही कहता, “मेरी मेहनत और मेरा भाग्य दोनों उस दिन मिट्टी में मिल गए, अब कुछ नहीं हो सकता।”
एक दिन गाँव में एक ज्ञानी महात्मा आए। सोहन की पत्नी ने उनसे मदद की गुहार लगाई। महात्मा सोहन के पास गए और देखा कि वह एक कोने में उदास बैठा है। महात्मा ने उसे एक छोटा सा प्रयोग करने को कहा। उन्होंने सोहन के हाथ में पानी से भरा एक भारी लोटा दिया और कहा, “इसे तब तक पकड़ो जब तक मैं न कहूँ।”
पाँच मिनट बाद सोहन का हाथ दर्द करने लगा। दस मिनट बाद उसका हाथ कांपने लगा। उसने विनती की, “महाराज, अब मैं इसे और नहीं थाम सकता।” महात्मा मुस्कुराए और बोले, “पुत्र, इस लोटे को नीचे रख दो। तुमने देखा? जितनी देर तुमने इसे पकड़े रखा, तुम्हारा दर्द उतना ही बढ़ता गया। अतीत के दुख भी इस लोटे की तरह हैं। उन्हें जितना ज्यादा पकड़ कर रखोगे, वे तुम्हें उतना ही अपंग बनाएंगे। जो बर्तन टूट गए, वे वापस नहीं आएंगे, लेकिन जो मिट्टी तुम्हारे सामने है, उससे नए और सुंदर बर्तन जरूर बन सकते हैं। याद रखो बीती ताहि बिसार दे आगे की सुध लेय।”
महात्मा की बात सोहन के दिल में उतर गई। उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने उसी क्षण अपनी आंखों के आँसू पोंछे और पुराने टुकड़ों को फेंककर नई मिट्टी तैयार की। उसने दोगुने उत्साह से काम करना शुरू किया। कुछ ही महीनों में उसके बर्तन पहले से भी अधिक सुंदर और मजबूत बनने लगे। इस बार उसने सावधानी बरती और शहर जाकर भारी मुनाफा कमाया।
