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प्रश्न
भारतीय कृषि की ‘निम्न उत्पादकता’ की समस्या को स्पष्ट कीजिए।
स्पष्ट करा
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उत्तर
भारतीय कृषि में कम उत्पादकता को वैश्विक मानकों की तुलना में प्रति इकाई भूमि पर कम पैदावार के रूप में परिभाषित किया जाता है। उदाहरण के लिए, भारत का औसत चावल उत्पादन लगभग 2.4 टन प्रति हेक्टेयर है, जो चीन की 4.7 टन की पैदावार से काफी कम है।
भारतीय कृषि में ‘निम्न उत्पादकता’ की समस्या:
- छोटी और खंडित जोतें: 85% से अधिक भारतीय किसान छोटे या सीमांत हैं, जिनके पास दो हेक्टेयर से कम भूमि है। इससे नई मशीनरी का उपयोग करना और बड़े पैमाने की बचत प्राप्त करना कठिन हो जाता है।
- मानसून पर निर्भरता: भारतीय कृषि को आज भी ‘मानसून का जुआ’ कहा जाता है। कुल कृषि क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा सिंचाई सुविधाओं से वंचित है और केवल वर्षा पर निर्भर है। अनिश्चित मानसून अक्सर फसलों को नष्ट कर देता है।
- मृदा क्षरण: रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग और दोषपूर्ण सिंचाई के कारण मिट्टी की उर्वरकता का कम होना। इसके परिणामस्वरूप मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी और लवणीयता बढ़ जाती है, जिससे भूमि धीरे-धीरे बंजर होने लगती है और फसल की पैदावार घट जाती है।
- तकनीकी अंतराल: आज भी भारत के कई हिस्सों में किसान पुरानी तकनीकों और लकड़ी के हल का उपयोग करते हैं। उच्च गुणवत्ता वाले बीजों (HYV seeds), उर्वरकों और कीटनाशकों की कमी या उन तक किसानों की पहुँच न होना उत्पादकता को प्रभावित करता है।
- आर्थिक बाधाएं: संस्थागत वित्त (बैंक ऋण) तक आसान पहुंच की कमी अक्सर छोटे किसानों को कर्ज के चक्र में फँसा देती है, जिससे वे गुणवत्तापूर्ण बीजों और उपकरणों में निवेश नहीं कर पाते हैं।
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2025-2026 (March) 64/2/2
