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अलाभकारी संस्थाओं के द्वारा निम्न मदों के लिए किए जाने वाले व्यवहार को दर्शाएं : i. वार्षिक चंदा ii. विशिष्ट दान iii. स्थायी परीसंपत्तियों का विक्रय iv. पुराने साप्ताहिकों/पाक्षिकों का विक्रय - Accountancy (लेखाशास्त्र)

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प्रश्न

अलाभकारी संस्थाओं के द्वारा निम्न मदों के लिए किए जाने वाले व्यवहार को दर्शाएं :

  1. वार्षिक चंदा
  2. विशिष्ट दान
  3. स्थायी परीसंपत्तियों का विक्रय
  4. पुराने साप्ताहिकों/पाक्षिकों का विक्रय
  5. खेलकूद के सामान का विक्रय
  6. आजीवन सदस्य्ता शुल्क
दीर्घउत्तर
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उत्तर

अलाभकारी संस्था के निम्न मदों के व्यवहार की व्याख्या इस प्रकार है: 

  1. वार्षिक चंदा- एक गैर-लाभकारी संस्था का सदस्य होने के नाते आपको एक निर्धारित शुल्क का भुगतान करना आवश्यक होता है। इस शुल्क को सदस्यता शुल्क कहते हैं जोकि सामान्य तौर पर वार्षिक होता है। इस शुल्क को किसी गैर-लाभकारी संगठन का राजस्व माना जाता है और जिसका उपयोग संगठन की गतिविधियों के संचालन में होता है। इस शुल्क के एवज में सदस्य को संगठन द्वारा प्रदान की जाने वाली सुविधाओं या संगठन की गतिविधियों में भाग लेने का अधिकार मिल जाता है। जैसे मिस्टर 'क' किसी स्पोर्ट्स क्लब के सदस्य बनते हैं और उन्हें दस हजार रुपये का वार्षिक शुल्क दिया है तो अब उन्हे सदस्य होने के नाते क्लब का खेल मैदान और खेल उपकरणों का प्रयोग करने का अधिकार है।
  2. विशिष्ट दान- ये गैर-लाभकरी संस्था द्वारा किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए प्राप्त किया जाने वाला दान होता है। जैसे किसी संस्था के भवन निर्माण के लिये दान, पुस्तकालय की स्थापना के लिये या पुस्तकालय में पुस्तकों की खरीद के लिये दान, संस्था की गतिविधियों के सुचारु रूप से संचालन हेतु आवश्यक उपकरणों की खरीद के लिये दान इत्यादि।
  3. स्थायी परिसंपत्तियों का विक्रय- एक निश्चित परिसंपत्ति की बिक्री पर लाभ को एक गैर-लाभकारी संस्था के राजस्व के रूप में माना जाता है और यह एक आय और व्यय खाते में उस लेखावर्ष की अवधि के अंतर्गत दिखाया जाता है जिसमें अचल संपत्ति निपटान किया गया।
  4. पुराने साप्ताहिकों/पाक्षिकों का विक्रय- पुराने अखबारों, दैनिक व साप्ताहिकों की बिक्री कर प्राप्त धनराशि को संस्था का राजस्व माना जाता है और इसे प्राप्ति व भुगतान खाते में डेबिट विवरण के अन्तर्गत लाया जाता है।
  5. खेलकूद के सामान का विक्रय- पुराने व उपयोग किये गये खेलकूद के सामान के विक्रय को भी संस्था का राजस्व माना जाता है और इसे भी प्राप्ति व भुगतान खाते में डेबिट विवरण के अन्तर्गत लाया जाता है।
  6. आजीवन सदस्य्ता शुल्क - कुछ सदस्य सामयिक चंदे के भुगतान के स्थान पर एकमुश्त राशि को आजीवन सदस्यता शुक्ल के रूप में भुगतान को चुनते हैं। इस राशि को पूँजी प्राप्ति माना जाता है और प्रत्यक्ष तौर पर पूँजी/सामान्य निधि में जमा किया जाएगा।
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अलाभकारी संस्थाओं के अभिलेखों का लेखांकर
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