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"अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले" पाठ में आए कथन "नेचर की सहनशक्ति की एक सीमा होती है”-के परिप्रेक्ष्य में कोई दो उदाहरण देकर प्रकृति के असंतुलन को स्पष्ट कीजिए।

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प्रश्न

"अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले" पाठ में आए कथन "नेचर की सहनशक्ति की एक सीमा होती है”-के परिप्रेक्ष्य में कोई दो उदाहरण देकर प्रकृति के असंतुलन को स्पष्ट कीजिए।

थोडक्यात उत्तर
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उत्तर

अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले पाठ के लेखक निदा फाजली जी ने कहा है कि, “नेचर की सहनशक्ति की एक सीमा होती है। प्रकृति का असंतुलन स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

पहला उदाहरण है, जंगलों की अंधाधुंध कटाई। पेड़ों की कटाई से न केवल जैव विविधता को नुकसान होता है, बल्कि इससे जलवायु परिवर्तन भी तेज हो जाता है, जिससे बाढ़, सूखा और अत्यधिक गर्मी जैसी समस्याए उत्पन्न होती हैं। अर्थात्‌ जब मनुष्य प्रकृति के साथ छेड़-छाड़ करता है तो उसका दुष्प्रभाव प्रकृति के असंतुलन से चुकाना पड़ता है जिससे मनुष्य को जान-माल की हानि होती है।

दूसरा उदाहरण देते हुए लेखक ने वर्सोवा के समुद्र तट पर आए तूफान के विषय में तथा मौसम के बदलाव का उल्लेख किया है। वास्तविक जीवन में भी हम मनुष्यों द्वारा किए गए प्रकृति के साथ छेड़-छाड़ का उदाहरण देख सकते हैं। मनुष्यों ने समुद्र के किनारे बड़ी-बड़ी इमारतें बना ली है जिसके परिणामस्वरूप सुनामी का प्रकोप देखा गया है। जमीन के भीतर की गई खुदाई और निर्माण के परिणामस्वरूप आए दिन भूकंप आते रहते हैं।

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