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आपने रैदास के पद पढ़े। अब आप रैदास की तरह ही महाराष्ट्र के संत कवि नामदेव के आगे दिए गए दो पद पढ़िए। निर्गुण संत काव्य परंपरा के संत कवि नामदेव का जन्म 13वीं – 14वीं शताब्दी में महाराष्ट्र

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प्रश्न

आपने रैदास के पद पढ़े। अब आप रैदास की तरह ही महाराष्ट्र के संत कवि नामदेव के आगे दिए गए दो पद पढ़िए। निर्गुण संत काव्य परंपरा के संत कवि नामदेव का जन्म 13वीं – 14वीं शताब्दी में महाराष्ट्र में हुआ। अन्य संत कवियों की भाँति नामदेव ने भी बाह्य आडंबरों, सामाजिक रूढ़ियों का विरोध कर सामाजिक समरसता, प्रेम एवं निराकार भक्ति से संबंधित पदों की रचना की है।

(1)

माइ न होती बापु न होता करम न होती काया।
हम नहिं होते, तुम नहिं होते, कवन कहां ते आया।।
राम कोइ न किसी केरा। जैसे तरवर पंखि बसेरा।।
चंद न होता, सूर न होता, पानी होता मिलाया।
सास्त्र न होता बेद न होता, करमु कहां ते आया।।
खेचरि भूचरि तुलसी माला गुरपरसादी पाया।
नामा प्रणवै परम तत्त कूं सतगुर मोहि लखाया।।

(2)

मोहि लागति तालाबेली।
बछरा बिनु गाइ अकेली।।
पानी बिनु ज्यूं मीन तलफैं।
ऐसे रामनाम बिनु नामा कलपै।।
जैसे गाइ का बाछा छूटला।।
थन चोखता माखन घूटला।।
नामदेउ नारायन पाया।
गुर भेटत ही अलख लखाया।।
जैसे विषै हेत परनारी।
ऐसे नामे प्रीति मुरारी।।
जैसे ताप ते निरमल घामा।
तैसे रामनाम बिनु बापुरो नामा।।

अब अपनी कक्षा में चर्चा कीजिए और बताइए कि रैदास तथा नामदेव के पदों में क्या-क्या अंतर है और क्या-क्या समानताएँ हैं?

सविस्तर उत्तर
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उत्तर

समानताएँ

  • दोनों संत कवि निर्गुण भक्ति धारा से संबंधित हैं।
  • दोनों रचनाओं में ईश्वर के निराकार स्वरूप और उसकी सर्वव्यापकता पर विशेष बल दिया गया है।
  • दोनों कवि कर्मकांड, बाहरी दिखावे और धार्मिक आडंबरों का विरोध करते हैं।
  • दोनों ने गुरु और भक्ति को जीवन में सर्वोच्च महत्व प्रदान किया है।
  • दोनों के पद सरल एवं लोकभाषा में रचे गए हैं।
  • दोनों संत प्रेम, समर्पण और समानता का संदेश देते हैं।

भिन्नताएँ

  • रैदास के पदों में भक्त और भगवान के बीच अटूट प्रेम तथा समर्पण (जैसे चंदन-पानी, दीपक-बाती) का चित्रण प्रमुखता से मिलता है।
  • वहीं नामदेव के पदों में प्रकृति, सृष्टि और जीवन से जुड़े उदाहरणों (जैसे गाय-बछड़ा, मछली-पानी) के माध्यम से भक्ति का स्वरूप समझाया गया है।
  • रैदास की रचनाओं में भावनात्मक समर्पण और उपमाओं का प्रयोग अधिक दिखाई देता है।
  • इसके विपरीत, नामदेव के पदों में दार्शनिक चिंतन और प्रकृति-आधारित उदाहरणों की प्रधानता है।
  • रैदास का ध्यान मुख्यतः भक्त-भगवान के व्यक्तिगत संबंध पर केंद्रित है।
  • जबकि नामदेव की दृष्टि अधिक व्यापक है और वे सृष्टि तथा जीवन के माध्यम से भक्ति का विवेचन करते हैं।

दोनों संत कवियों का मूल उद्देश्य ईश्वर-भक्ति, समानता और आडंबरों का विरोध करना है, किंतु उनकी अभिव्यक्ति की शैली और दृष्टिकोण एक-दूसरे से भिन्न हैं।

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पाठ 8: पद - अभ्यास [पृष्ठ १५०]

APPEARS IN

एनसीईआरटी Hindi Ganga [English] Class 9
पाठ 8 पद
अभ्यास | Q 1. | पृष्ठ १५०
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