हिंदी

विजय केवल लोहे की नहीं, धर्म की रही धरा पर धूम भिक्षु होकर रहते सम्राट, दया दिखलाते घर-घर घूम यवन को दिया दया का दान, चीन को मिली धर्म की दृष्टि मिला था स्वर्ण-भूमि को रत्न, शील की सिंहल - Hindi (Second/Third Language) [हिंदी (दूसरी/तीसरी भाषा)]

Advertisements
Advertisements

प्रश्न

निम्नलिखित पठित पद्यांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए: 

विजय केवल लोहे की नहीं, धर्म की रही धरा पर धूम
भिक्षु होकर रहते सम्राट, दया दिखलाते घर-घर घूम।

‘यवन’ को दिया दया का दान, चीन को मिली धर्म की दृष्टि
मिला था स्वर्ण-भूमि को रत्न, शील की सिंहल को भी सृष्टि।

किसी का हमने छीना नहीं, प्रकृति का रहा पालना यहीं
हमारी जन्मभूमि थी यहीं, कहीं से हम आए थे नहीं।

चरित थे पूत, भुजा में शक्ति, नम्रता रही सदा संपन्न
हृदय के गौरव में था गर्व, किसी को देख न सके विपन्न।

(1) कृति पूर्ण कीजिए:  (2)

(2) उत्तर लिखिए:

  1.  पद्यांश से लय-ताल युक्त शब्द ढूँढ़कर लिखिए:  (1)
    1. .............  .............
    2. .............  .............
  2. निम्नलिखित प्रत्यययुक्त शब्दों के मूलशब्द पद्यांश से ढूँढ़कर लिखिए:  (1)
    1. दयालु -
    2. प्राकृतिक -

(3) उपर्युक्त पद्यांश की प्रथम चार पंक्तियों का सरल अर्थ 25 से 30 शब्दों में लिखिए।  (2)

आकलन
Advertisements

उत्तर

(1)

 (2)

    1. धूम-धूम, दृष्टि-सृष्टि
    2. संपन्न-विपन्न, यहीं-नहीं
    1. दयालु - दया
    2. प्राकृतिक - प्रकृति

(3) कवि के अनुसार सच्ची विजय केवल युद्ध और शस्त्रों से नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा से प्राप्त होती है। सम्राट अशोक ने भिक्षु बनकर करुणा और दया का प्रसार किया तथा घर-घर जाकर मानवता का संदेश दिया। उन्होंने यवनों को दया का उपहार दिया और चीन में धर्म का प्रचार किया।

shaalaa.com
  क्या इस प्रश्न या उत्तर में कोई त्रुटि है?
2024-2025 (March) Official
Share
Notifications

Englishहिंदीमराठी


      Forgot password?
Use app×