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प्रश्न
निम्नलिखित विषय पर हिन्दी में निबन्ध लिखिए जो लगभग 400 शब्दों से कम न हो:
आपके पिता ने सपरिवार देशाटन की योजना बनाई और आप सब पूरी तैयारी के साथ यात्रा पर निकल पड़े देश के अद्भुत प्राकृतिक सौन्दर्य ने आपको मंत्रमुग्ध कर दिया। उस यात्रा के दौरान जो आनन्द की अनुभूति आपने की, उसका वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
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उत्तर
“देशाटन”
प्रकृति एक चमत्कारी शक्ति है, जो हर क्षण अपना रूप बदलती रहती है। मानव सहित संसार के सभी जीवों ने उसी की गोद में पलकर विकास किया है। प्रकृति ने सदा सभी प्राणियों को प्रेम, स्नेह और संरक्षण दिया है तथा उनके जीवन को आगे बढ़ाया है। उसी के कारण संसार गतिमान है और उसी की मायावी छवि हमें चारों ओर दिखाई देती है।
जब मनुष्य अपने दैनिक कार्यों की व्यस्तता से ऊबने लगता है और जीवन में नयापन चाहता है, तब वह कुछ समय के लिए प्रकृति के समीप जाने की इच्छा करता है। वह चाहता है कि रोज़मर्रा की दिनचर्या से दूर जाकर कुछ दिन शांति से बिताए। एक दिन प्रातः नाश्ते के समय माता जी ने पिता जी से सुझाव दिया कि क्यों न दो–चार दिन के लिए कहीं घूम आया जाए।
यह विचार पिता जी को पसंद आया। उन्होंने कार्यालय की अवकाश व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए चार दिनों के अवकाश हेतु आवेदन किया, जिसमें से दो दिन स्वीकृत हो गए। इसके बाद उन्होंने अगले महीने के दूसरे सप्ताह के लिए ‘हेल्म एक्सप्रेस’ से आने–जाने का आरक्षण करवा लिया।
इस निर्णय से मैं और मेरी छोटी बहन बहुत प्रसन्न थे। हम प्रतिदिन यात्रा से जुड़ी वस्तुएँ इकट्ठी करने लगे। माता जी भी तैयारियों में व्यस्त थीं और मैं उनका सहयोग कर रहा था। हमने एक विस्तृत सूची बनाई कपड़े, चादरें, पानी का कैम्पर, जूते–चप्पल, बर्तन, रास्ते का नाश्ता, भोजन की व्यवस्था, रुकने के स्थान और पूरे कार्यक्रम की समय-सारिणी।
तैयारियों में समय कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला और यात्रा का दिन आ गया। उस दिन पिता जी को कार्यालय जाना था, लेकिन वे साढ़े चार बजे घर लौट आए। सभी तैयार थे। टैक्सी पहले से बुक थी। थोड़ी देर में टैक्सी आई और हम लगभग पाँच बजे स्टेशन पहुँच गए।
सूर्योदय का समय था। दृश्य अत्यंत मनमोहक था। गाड़ियों की आवाजाही, लोगों की चहल–पहल, सुरक्षा और स्वच्छता की व्यवस्थाएँ, पक्षियों का कलरव और बंदरों की अठखेलियाँ, सब कुछ बहुत अच्छा लग रहा था। शीघ्र ही हमारी ट्रेन आई और हम अपने कोच में बैठ गए। कुली की सहायता से सामान व्यवस्थित कर दिया गया और ट्रेन चल पड़ी।
लगभग एक घंटे बाद ट्रेन ने चंबल नदी पार की और चारों ओर अंधेरा छा गया। थकान के कारण हम सो गए। सुबह उठने पर देखा कि ट्रेन मध्य प्रदेश और गुजरात के जंगलों से गुजर रही थी। बीच–बीच में बस्तियाँ, पहाड़ी किले और खेत दिखाई दे रहे थे। हरियाली मन को शांति दे रही थी। ताप्ती नदी पार कर ट्रेन महाराष्ट्र में प्रवेश कर गई। पूरे दिन की यात्रा के बाद शाम 5:20 बजे हम अपने गंतव्य पर पहुँचे और स्टेशन के पास एक होटल में विश्राम किया। अगले दिन टैक्सी से भ्रमण के लिए निकले।
यात्रा के दौरान नाश्ता और भोजन करते हुए हम आगे बढ़ते रहे। अहमदनगर होते हुए शनि शिंगणापुर, घृष्णेश्वर महादेव के दर्शन किए और फिर एलोरा की गुफाएँ देखने पहुँचे। पिता जी ने बताया कि इन गुफाओं के निर्माण में लगभग 200 वर्ष लगे। लगभग 34 गुफाओं में स्थित शिव मंदिर और उसकी वास्तुकला हमारी उत्कृष्ट मूर्तिकला का प्रमाण हैं, हालाँकि विदेशी आक्रमणकारियों ने उन्हें क्षति पहुँचाई।
रात्रि विश्राम के बाद हमने शिरडी, भीमाशंकर, त्र्यंबकेश्वर और विश्वेश्वर गणेश के दर्शन किए। अगले दिन महाबलेश्वर के लिए रवाना हुए। रास्ते में सतारा में शिव दर्शन किए और सुंदर प्राकृतिक दृश्यों को निहारते हुए महाबलेश्वर पहुँचे। वहाँ वर्षा हो रही थी। घाटियाँ बादलों से घिरी थीं, बादल हमारे शरीर को स्पर्श करते हुए गुजर रहे थे और ठंडी हवा मन को आनंदित कर रही थी।
शाम होते–होते हम पुणे की ओर लौट चले। रात्रि विश्राम के बाद सुबह पांडु से हडपसर गणेश मंदिर में पूजा की। इसके बाद भोजन और भ्रमण कर हम शाम को पुणे से अपने घर के लिए रवाना हुए।
पूरी रात और पूरा दिन की यात्रा के बाद शाम 5:35 बजे हम अपने स्टेशन पहुँचे। टैक्सी से घर जाकर भोजन किया और यात्रा के अनुभव साझा करते हुए सो गए।
जब भी उस यात्रा को स्मरण करता हूँ, मन आनंद से भर जाता है। भारतीय होने पर मुझे गर्व महसूस होता है। वास्तव में, भ्रमण प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की एक आवश्यक और अनिवार्य आवश्यकता है।
