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प्रश्न
निम्नलिखित विषय पर दिए गए संकेत-बिंदुओं के आधार पर 80-100 शब्दों में अनुच्छेद लिखिए:
सत्संगति
- सत्संगति का अर्थ
- सत्संगति का महत्त्व
- कुसंगति से हानि
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उत्तर
संगति के बारे में कई सार्थक और सही कहानियां कही गई हैं। विभिन्न कहानीकारों ने सत्संगति की महत्ता को अपनी कमियों का विषय बनाया है, जिसके माध्यम से उन्होंने सत्संगति का प्रभाव लोगों के जीवन पर दिखाया है। श्री तुलसीदास का कथन सार्थक है कि-
एक घड़ी आधी घड़ी आधी में पुनिआध।
तुलसी संगति साधु की कटै कोटि अपराध॥
सज्जन लोगों से सत्संग पाकर बहुत साधारण लोग महान हो गए। जीवन को सुधारें, अपने लक्ष्यों को बदलें और महान बनें। पातकी अंगुलिमाल ने महात्मा बुद्ध के पास आकर अपनी हिंसक प्रवृत्ति छोड़ दी। यह संगति का असर है। यही कारण है कि सत्संगति सद्गुणों का विकास करती है। मनुष्य के अंतिम विचारों को दूर कर एक प्रवृत्ति बनाती है। बुरे लोगों के पास बैठने का असर वैसा ही होता है जैसे सज्जनों के संपर्क में आने से उनकी संगति प्रभावित होती है।
इन तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि श्री तुलसीदास जी ने सत्य ही कहा है कि-
सठ सुधरहि सत्संगति पाई। परस परस कुघात सुहाई॥
इसलिए महापुरुषों का सत्संग तीर्थ से भी बढ़कर है, या यह कहा जाए कि महापुरुषों की संगति चलती हुई एक तीर्थ है, जिससे बारह वर्ष बाद आने वाले महाकुंभके स्नान से भी बढ़कर पुण्य मिलता है, जिसका फल तुरंत मिलता है। यही कारण है कि प्रभु की कहानी के अनुसार अच्छी संगति से जीवन शुद्ध होता है।
रघुवंश की राजरानी कैकेयी, विदुषी, सद्गुणसंपन्न, वीरांगना, राजा दशरथ की प्रिय भार्या और भरत नामक चरित्रवान पुत्र की माता, मंथरा के कुसंग को नकार नहीं सकी और सदा लोगों के लिए हेय रहती थी। जब कैकेयी मंथरा से मिली, तो वह राम को वन भेजने के लिए हठ कर बैठी। इस विषय में तुलसीदास ने कहा कि-
को न कुसंगति पाई नसाई। रहे न नीच मतों चतुराई॥
अतः विद्वान मानव समाज को प्रेरित करते आए हैं कियथासंभव कुसंग से, परनिंदा से बचना चाहिए।
