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प्रश्न
निचे दिए गए विषय पर निबन्ध लिखिए जो लगभग 400 शब्दों से कम न हो:
एक मौलिक कहानी लिखिए जिसका अन्तिम वाक्य हो:
........ और अपने घर सकुशल पहुँचने पर हमने चैन की साँस ली।
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उत्तर
अविस्मरणीय रोमांच: एक पहाड़ी सफर
प्रस्तावना
साहसिक यात्राएँ हमेशा आनंददायक नहीं होतीं, कभी-कभी वे जीवन की सबसे बड़ी चुनौती बन जाती हैं। मानव मन रोमांच की तलाश में अक्सर दुर्गम रास्तों पर निकल पड़ता है, लेकिन प्रकृति कब अपना विकराल रूप दिखा दे, यह कोई नहीं जानता। ऐसी ही एक घटना मेरे साथ पिछले साल हुई, जब मैंने और मेरे तीन मित्रों ने हिमालय की निचली पहाड़ियों पर 'ट्रेकिंग' करने का निर्णय लिया।
सफर की शुरुआत बेहद उत्साहजनक थी। चारों ओर हरियाली, ऊँचे देवदार के वृक्ष और ठंडी हवाएँ हमारा स्वागत कर रही थीं। हम सुबह जल्दी अपनी मंजिल की ओर निकल पड़े थे। लक्ष्य था सूर्यास्त से पहले पहाड़ी की चोटी पर बने पुराने विश्राम गृह तक पहुँचना। दोपहर तक सब कुछ योजना के अनुसार चल रहा था। हम हँसते-गाते और प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लेते हुए आगे बढ़ रहे थे।
दोपहर के बाद अचानक मौसम ने करवट ली। पहाड़ों में मौसम का मिजाज पल भर में बदल जाता है। गहरे काले बादलों ने सूरज को ढँक लिया और देखते ही देखते मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। बारिश इतनी तेज थी कि सामने का रास्ता दिखना बंद हो गया। हमने एक गुफा के पास शरण ली, लेकिन असली मुसीबत तब शुरू हुई जब शाम होने लगी और तापमान तेजी से गिरने लगा। हमें अहसास हुआ कि हम अपना रास्ता भटक चुके हैं।
अँधेरा गहराने लगा था और जंगली जानवरों की आवाजें डराने लगी थीं। मोबाइल नेटवर्क गायब था और हमारे पास मौजूद टॉर्च की रोशनी भी कम पड़ रही थी। हम डर और ठंड से कांप रहे थे। तभी हमें दूर एक छोटी सी रोशनी दिखाई दी। हमने हिम्मत जुटाई और कीचड़ भरे ढलानों पर फिसलते हुए उस ओर बढ़े। वह एक स्थानीय चरवाहे की कुटिया थी। उस भले व्यक्ति ने हमें न केवल सिर छिपाने की जगह दी, बल्कि गरम चाय और रोटियाँ भी खिलाईं। उस रात हमने जाना कि इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है।
अगली सुबह बारिश तो थम गई थी, लेकिन रास्तों पर जगह-जगह पत्थर गिर रहे थे। चरवाहे ने हमें मुख्य सड़क तक पहुँचाने में मदद की। जब हम नीचे पहुँचे, तो देखा कि भूस्खलन के कारण कई रास्ते बंद हो चुके थे। जैसे-तैसे हमने एक बस पकड़ी। पूरे रास्ते हम बस यही प्रार्थना कर रहे थे कि सुरक्षित अपने माता-पिता के पास पहुँच जाएँ। शरीर बुरी तरह थक चुका था, लेकिन मन में घर पहुँचने की व्याकुलता थी। शहर की सीमा में प्रवेश करते ही हमें वह सुकून मिला जो शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।
