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प्रश्न
“म्लेच्छों ने मुझे मुलतान की लूट में पकड़ लिया। मैं उनकी कठोरता में जीवित रहकर बराबर उनका विरोध ही करती रही।” कथन के आधार पर इरावती की व्यथा का वर्णन करते हुए उसका चरित्र-चित्रण कीजिए।
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उत्तर
हिन्दू कन्या इरावती को मुल्तान ने लूट लिया था और उसे दासी बना दिया था। मलेच्छों के क्रूर और क्रूर व्यवहार के बीच भी वह भयभीत नहीं हुई या कमजोर नहीं हुई। उसे काशी के एक महाजन के हाथों पांच सौ दिरहम में बेच दिया जाता है। इरावती स्त्री जाति के सम्मान, प्रतिष्ठा और गौरव पर आँच नहीं आने देती। बलराज के प्रेम प्रदर्शन पर वह उसे बताती है कि वह अपवित्र हो चुकी है। वह स्पष्टवादिता का परिचय इस तरह देती है। महाजन कहते हैं कि वह हर बुरा काम करती है। दासी जीवन के कष्टों को सहन करती है। इरावती बलराज मालिक और हर किसी के प्रति अच्छी तरह से ईमानदार है। इरावती भी खुद के प्रति सजग है। बलराज के व्यवहार से वह दुखी है। बलराज की पत्नी बनने का प्रस्ताव उसने ठुकरा दिया। वह बताती है कि उसने सेठ को पत्र लिखकर बताया है कि वह उसके घर में बहुत बुरा काम करेगी और कभी विद्रोह या भागने की इच्छा नहीं करेगी। उसने सिर पर एक तृण रखकर खुद को बेचने की इजाज़त दी है। इरावती मालिक के प्रति ईमानदार और स्पष्टवादी है। बलराज से कुछ भी नहीं छुपाती। युद्ध में घायल हुए बलराज को पानी पिलाती है। तिलक भी अपनी बहन इरावती को देखता है। अंततः बलराज जाटों का सरदार बनता है और इरावती उसकी रानी बनती है। युद्ध और पीड़ा से भरे इरावती के जीवन में अंततः खुशी आती है।
