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प्रश्न
क्या बुद्धि के संप्रत्ययीकरण में कुछ संस्कृतिक भिन्नताएं होती है?
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उत्तर
संस्कृति रीति - रिवाजों, विश्वासों, अभिवृत्तियों तथा कला और साहित्य में उपलब्धियों की एक सामूहिक व्यवस्था को कहते हैं। इन सांस्कृतिक प्राचालों के अनुरूप ही किसी व्यक्ति की बुद्धि के ढलने की संभावना होती है। अनेक सिद्धांतकार बुद्धि को व्यक्ति की विशेषता समझते हैं और व्यक्ति की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की अपेक्षा कर देते है परन्तु अब बुद्धि के सिद्धांतो में संस्कृति की अनन्य विशेषताओं को भी स्थान मिलने लगा है। स्टर्नबर्ग के सांदर्भिक अथवा व्यावहारिक बुद्धि का अर्थ यह है कि बुद्धि संस्कृति का उत्पादन होती है। वाईगोट्स्की का भी विश्रास था की व्यक्ति की तरह संस्कृति का भीं अपना एक जीवन होता है, संस्कृति का भी विकास होता है और उसमे परिवर्तन होता है। इसी प्रक्रिया में संस्कृति ही निर्धारित करती है की अंततः किसी व्यक्ति का बोद्धिक विकास किस प्रकार का होगा। वाईगॉटस्की के अनुसार, कुछ प्रारंभिक मानसिक प्रक्रियाएँ, (जैसे - रोना माता की आवाज की ओर ध्यान देना, सूंघना, चलना, दौड़ना आदि)जैसे - समस्या का समाधान करने तथा चिंतन करने आदि की शैलिया मुख्यतः संस्कृत्ति का प्रतिफल होती है।
तकनीकी रूप से विकसित समाज के व्यक्ति ऐसी बाल - पोषण नीतियाँ अपनाते हैं जिससे बच्चों में सामान्यीकरण तथा अमूर्तकारन, गति, न्यूनतम प्रयास करने तथा मानसिक स्तर पर वस्तुओं का प्रहस्त्र करने की क्षमता विकसित हो सके। ऐसे समाज बच्चों में एक विशेष प्रकार के व्यवहार के विकास को बढ़ावा देते है जिसे हम तकनीकी - बुद्धि कह सकते हैं। ऐसे समाजों में व्यक्ति अवधान देने, प्रेक्षण करने, विश्लेषण करने, अच्छा निष्पादन करने, तेज काम करने तथा उपलब्धि की ओर उन्मुख रहने आदि कौशलों की परीक्षा की जाती है।
एशिया तथा अफ्रीका के अनेक समाजो में तकनीकी बुद्धि को उतना महत्व नहीं दिया जाता। एशिया तथा अफ्रीका की संस्कृतियों में पश्चिमी देशों की अपेक्षा पूर्णतः भित्र गुणों तथा कौशलों को बुद्धि का परिचायक माना जाता है। गैर - पश्चिमी संस्कृतियों में व्यक्ति की अपनी संज्ञानात्मक सक्षमता के साथ - साथ उसमे समाज के दूसरे व्यक्तियों के साथ सामाजिक संबंध बनाने के कौशलों को भी बुद्धि का लक्षण माना जाता है। कुछ गैर - पश्चिमी समाजो में समाज - केंद्रित तथा सामूहिक उन्मुखता पर बल दिया जाता है
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