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प्रश्न
‘दासी’ कहानी का शीर्षक उपयुक्त तथा सार्थक है - इस कथन के सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त कीजिए। क्या इस कहानी का कोई और शीर्षक हो सकता था? तर्क सहित स्पष्ट कीजिए।
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उत्तर
दासी जयशंकर प्रसाद जी द्वारा रचित एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक कहानी है। इस कथा की नायिका इरावती एक हिंदू कन्या है, जिसे मुल्तान के युद्ध में बंदी बना लिया गया और दासी बना दिया गया। बाद में काशी के एक महाजन ने उसे पाँच सौ दिरहम देकर कठोर शर्तों पर खरीद लिया। दूसरी प्रमुख दासी पात्र फिरोजा है, जो एक राजकुमारी-दासी है। फिरोजा को मुक्त कराने के लिए अहमद द्वारा एक हज़ार सैनिक सिक्के भेजे जाने थे, किंतु वे समय पर नहीं पहुँच सके। इसके बावजूद राजा साहब बिना धन प्राप्त किए ही फिरोजा को मुक्त कर देते हैं।
बलराज एक साहसी जाट वीर है, जिसने तुर्क सुल्तान महमूद की ओर से सियालकोट में युद्ध किया था। युद्ध में पराजय होने पर सुल्तान ने उसे अपने पद से हटा दिया। इस अपमान और दुःख से व्यथित होकर बलराज आत्महत्या करने का विचार करता है, लेकिन फिरोजा उसे ऐसा करने से रोक लेती है। बलराज इरावती से प्रेम करता है, किंतु निर्धनता के कारण उससे विवाह नहीं कर पाता। कथा के अंत में बलराज जाटों की सेना का सेनापति बनता है और तुर्क सेना के विरुद्ध युद्ध में विजय प्राप्त करता है, हालाँकि इस युद्ध में अहमद वीरगति को प्राप्त होता है।
इस प्रकार बलराज और इरावती का मिलन संभव हो पाता है, लेकिन अहमद की मृत्यु के कारण फिरोजा का मिलन नहीं हो पाता। जहाँ अहमद मारा जाता है, वहीं उसकी समाधि बनती है और फिरोजा दासी के रूप में वहीं रहकर उसकी सेवा करती है। वह समाधि पर फूल चढ़ाती हुई अपना शेष जीवन व्यतीत करती है।
कहानी का शीर्षक अत्यंत सरल और सार्थक है। प्राचीन काल में दास प्रथा प्रचलित थी, जिसमें दासों का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं माना जाता था और उन्हें वस्तुओं की तरह खरीदा-बेचा जाता था। फिर भी वे मनुष्य ही थे और उनमें मानवीय गुण विद्यमान थे। फिरोजा और इरावती दोनों स्त्री पात्रों में एकनिष्ठता, साहस, पवित्र प्रेम और देशभक्ति की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इस दृष्टि से दासी शीर्षक पूरी तरह उपयुक्त है और पाठकों तक कहानी का भाव प्रभावी ढंग से पहुँचाता है। यह कहानी इरावती शीर्षक से भी प्रस्तुत की जा सकती थी।
