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Balbharati solutions for हिंदी - कुमारभारती १० वीं कक्षा Hindi - Kumarbharati 10th Standard SSC Maharashtra State Board chapter 2 - चलो आज हम दीप जलाएँ [Latest edition]

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हिंदी - कुमारभारती १० वीं कक्षा Hindi - Kumarbharati 10th Standard SSC Maharashtra State Board - Shaalaa.com

Chapter 2: चलो आज हम दीप जलाएँ

स्वाध्यायअभिव्यक्तिअपठित पद्यांश
स्वाध्याय [Page 118]

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सुचना के अनुसाि कृतियाँ कीतिए

स्वाध्याय | Q (१) १. | Page 118

कारण लिखिए :

हल्दी घाटी पर दीपक जलाने का ______ 

स्वाध्याय | Q (१) २. | Page 118

कारण लिखिए :

कारगिल के शिखरों पर दीपक जलाने का ______ 

स्वाध्याय | Q (२) | Page 118

जोड़ियाँ मिलाइए :

उत्तर
१. राणा प्रताप धरती ______
२. रानी लक्ष्मीबाई कारागृह ______
३. शिवाजी महाराज गंगा तट ______
4. कुँअर सिंह रक्त ______
5. जलियाँवाला बाग घोड़ा ______
  समाधि ______
स्वाध्याय | Q (३) १. | Page 118

निम्न स्थान का महत्त्व दो-तीन वाक्यों में लिखिए :

जलियाँवाला बाग 

स्वाध्याय | Q (३) २. | Page 118

निम्न स्थान का महत्त्व दो-तीन वाक्यों में लिखिए :

हल्दी घाटी 

स्वाध्याय | Q (४) | Page 118

निम्न मुद्दों पर आधारित पद्य का विश्लेषण कीजिए :

१. रचनाकार का नाम

२. रचना की विधा

३. पसंदीदा पंक्ति

४. पसंद होने के कारण

५. कविता प्राप्त प्रेरणा/संदेश

स्वाध्याय | Q (५) | Page 118

भावार्थ लिखिए :

लक्ष्मीबाई का घोड़ा था, ____________
_______________________________
_______________________________
_____________________गंगा तट पर।

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अभिव्यक्ति [Page 118]

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अभिव्यक्ति | Q १. | Page 118

'मानवता ही सच्चा धर्म है' पर अपने विचार लिखिए |

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अपठित पद्यांश [Page 119]

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अपठित पद्यांश | Q (१) | Page 119

परिच्छेद पढ़कर सूचना के अनुसार कृतियाँ कीजिए :

      परोपकार ही मानवता है, जैसा कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा है - ‘वही मनुष्य है जो मनुष्य के लिए मरे।’ केवल अपने दुख-सुख की चिंता करना मानवता नहीं, पशुता है। परोपकार ही मानव को पशुता से सदय बनाता है। वस्तुतः निस्स्वार्थ भावना से दूसरों का हित साधन ही परोपकार है। मनुष्य अपनी सामर्थ्य के अनुसार परोपकार कर सकता है। दूसरों के प्रति सहानुभूति करना ही परोपकार है और सहानुभूति किसी भी रूप में प्रकट की जा सकती है। किसी निर्धन की आर्थिक सहायता करना अथवा किसी असहाय की रक्षा करना परोपकार के रूप हैं। किसी पागल अथवा रोगी की सेवा-शुश्रूषा करना अथवा किसी भूखे को अन्नदान करना भी परोपकार है। किसी को संकट से बचा लेना, किसी को कुमार्ग से हटा देना, किसी दुखी-निराश को सांत्वना देना-ये सब परोपकार के ही रूप हैं। कोई भी कार्य, जिससे किसी को लाभ पहॅुंचता है, परोपकार है, जो अपनी सामर्थ्य के अनुसार विभिन्न रूपों में किया जा सकता है।

संजाल पूर्ण कीजिए :

 

अपठित पद्यांश | Q (२) | Page 119

परिच्छेद पढ़कर सूचना के अनुसार कृतियाँ कीजिए :

      परोपकार ही मानवता है, जैसा कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा है - ‘वही मनुष्य है जो मनुष्य के लिए मरे।’ केवल अपने दुख-सुख की चिंता करना मानवता नहीं, पशुता है। परोपकार ही मानव को पशुता से सदय बनाता है। वस्तुतः निस्स्वार्थ भावना से दूसरों का हित साधन ही परोपकार है। मनुष्य अपनी सामर्थ्य के अनुसार परोपकार कर सकता है। दूसरों के प्रति सहानुभूति करना ही परोपकार है और सहानुभूति किसी भी रूप में प्रकट की जा सकती है। किसी निर्धन की आर्थिक सहायता करना अथवा किसी असहाय की रक्षा करना परोपकार के रूप हैं। किसी पागल अथवा रोगी की सेवा-शुश्रूषा करना अथवा किसी भूखे को अन्नदान करना भी परोपकार है। किसी को संकट से बचा लेना, किसी को कुमार्ग से हटा देना, किसी दुखी-निराश को सांत्वना देना-ये सब परोपकार के ही रूप हैं। कोई भी कार्य, जिससे किसी को लाभ पहॅुंचता है, परोपकार है, जो अपनी सामर्थ्य के अनुसार विभिन्न रूपों में किया जा सकता है।

‘वही मनुष्य है जो मनुष्य के लिए मरे’ इस पंक्ति का तात्पर्य लिखिए। 

अपठित पद्यांश | Q (३) १. | Page 119

परिच्छेद पढ़कर सूचना के अनुसार कृतियाँ कीजिए :

      परोपकार ही मानवता है, जैसा कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा है - ‘वही मनुष्य है जो मनुष्य के लिए मरे।’ केवल अपने दुख-सुख की चिंता करना मानवता नहीं, पशुता है। परोपकार ही मानव को पशुता से सदय बनाता है। वस्तुतः निस्स्वार्थ भावना से दूसरों का हित साधन ही परोपकार है। मनुष्य अपनी सामर्थ्य के अनुसार परोपकार कर सकता है। दूसरों के प्रति सहानुभूति करना ही परोपकार है और सहानुभूति किसी भी रूप में प्रकट की जा सकती है। किसी निर्धन की आर्थिक सहायता करना अथवा किसी असहाय की रक्षा करना परोपकार के रूप हैं। किसी पागल अथवा रोगी की सेवा-शुश्रूषा करना अथवा किसी भूखे को अन्नदान करना भी परोपकार है। किसी को संकट से बचा लेना, किसी को कुमार्ग से हटा देना, किसी दुखी-निराश को सांत्वना देना-ये सब परोपकार के ही रूप हैं। कोई भी कार्य, जिससे किसी को लाभ पहॅुंचता है, परोपकार है, जो अपनी सामर्थ्य के अनुसार विभिन्न रूपों में किया जा सकता है।

वचन परिवर्तन कीजिए :

१. चिंता - ______ ______
२. भूखे - ______ ______
अपठित पद्यांश | Q (३) २. | Page 119

परिच्छेद पढ़कर सूचना के अनुसार कृतियाँ कीजिए : 

      परोपकार ही मानवता है, जैसा कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा है - ‘वही मनुष्य है जो मनुष्य के लिए मरे।’ केवल अपने दुख-सुख की चिंता करना मानवता नहीं, पशुता है। परोपकार ही मानव को पशुता से सदय बनाता है। वस्तुतः निस्स्वार्थ भावना से दूसरों का हित साधन ही परोपकार है। मनुष्य अपनी सामर्थ्य के अनुसार परोपकार कर सकता है। दूसरों के प्रति सहानुभूति करना ही परोपकार है और सहानुभूति किसी भी रूप में प्रकट की जा सकती है। किसी निर्धन की आर्थिक सहायता करना अथवा किसी असहाय की रक्षा करना परोपकार के रूप हैं। किसी पागल अथवा रोगी की सेवा-शुश्रूषा करना अथवा किसी भूखे को अन्नदान करना भी परोपकार है। किसी को संकट से बचा लेना, किसी को कुमार्ग से हटा देना, किसी दुखी-निराश को सांत्वना देना-ये सब परोपकार के ही रूप हैं। कोई भी कार्य, जिससे किसी को लाभ पहॅुंचता है, परोपकार है, जो अपनी सामर्थ्य के अनुसार विभिन्न रूपों में किया जा सकता है।

निम्न शब्दों के लिंग पहचानिएः

१. सामर्थ्य - ______
२. परोपकार - ______
अपठित पद्यांश | Q (४) | Page 119

‘परहित सरिस धरम नहिं भाई’ पर अपने विचार लिखिए।

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Chapter 2: चलो आज हम दीप जलाएँ

स्वाध्यायअभिव्यक्तिअपठित पद्यांश
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