Advertisement Remove all ads

गद्य भाग

Advertisement Remove all ads

Topics

If you would like to contribute notes or other learning material, please submit them using the button below.

Related QuestionsVIEW ALL [407]

विजयदान देथा की कहानी 'दुविधा' (जिस पर 'पहेली' फ़िल्म बनी है) के अंश को पढ़ कर आप देखेंगे/देखेंगी कि भगत जी की संतुष्ट जीवन-दृष्टि की तरह ही गड़रिए की जीवन-दृष्टि है, इससे आपके भीतर क्या भाव जगते हैं?
गडरिया बर्गर कहँ‘ हाँ उम के दिल र्का बात समझ गया,
पर अँगूंती कबूल नहीं र्का । काली दाहीं के बीच पीले दाँतों‘
की हँसी” हँसते हुए बोला ” मैं कोइ राजा नहीं हुँ जो न्याय
की कीमत वसूल करू। मैंने तो अटका काम निकाल
दिया । आँर यह अँगूठी मेरे किस काम ! न यह
अँगुलियों में आती हैं, न तड़े यें। मरी भेड़े‘ भी मेरी तरह
गाँवार हँ‘। घास तो खाती हैं, पर सोना सूँघती तक नहाँ।
बेकार र्का वस्तुएँ तुम अमरों को ही शोभा देती हैं।”
विजयदान देथा
Advertisement Remove all ads
Share
Notifications

View all notifications


      Forgot password?
View in app×